काम, क्रोध, लोभ और मोह की आग में झुलसता मानव जीवन: आधुनिकता की दौड़ में नैतिक पतन का गंभीर संकट
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज का समय अभूतपूर्व भौतिक प्रगति, तकनीकी उन्नति और सुविधाओं का युग है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गहरी चिंता छिपी है—मानव के भीतर नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का निरंतर क्षरण। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे चार प्रमुख विकार मानव जीवन को भीतर से खोखला करते जा रहे हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में व्यक्ति अपने संस्कार, रिश्तों की मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्वों को पीछे छोड़ता जा रहा है, जिसका परिणाम परिवारों के विघटन, सामाजिक तनाव और मानसिक अशांति के रूप में सामने आ रहा है।
यह प्रश्न आज केवल धार्मिक या दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी गहराई से महसूस किया जा रहा है। काम, क्रोध, लोभ और मोह का बढ़ता प्रभाव व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों को प्रभावित कर रहा है।
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धर्मग्रंथों की चेतावनी और आज की वास्तविकता
भारतीय संस्कृति ने सदियों पहले ही इन विकारों के खतरे को पहचाना था।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा का पतन करते हैं। वहीं रामचरितमानस में भी इन अवगुणों से बचकर संयमित और मर्यादित जीवन अपनाने की प्रेरणा दी गई है।
संत-महात्माओं का मत रहा है कि जब तक मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण नहीं रखेगा, तब तक वास्तविक शांति और संतोष संभव नहीं है। लेकिन वर्तमान समाज में भौतिक उपलब्धियों की होड़ ने आत्मचिंतन की प्रक्रिया को लगभग समाप्त कर दिया है। व्यक्ति बाहरी सफलता को ही जीवन की अंतिम उपलब्धि मान बैठा है।
काम, क्रोध, लोभ और मोह: सामाजिक समस्याओं की जड़
आज यदि हम समाज की प्रमुख समस्याओं पर दृष्टि डालें, तो पाएंगे कि अपराध, भ्रष्टाचार, पारिवारिक कलह और हिंसा की जड़ में यही चार विकार हैं।
लोभ भ्रष्टाचार और अनैतिक कमाई को जन्म देता है।
क्रोध रिश्तों को तोड़ता और हिंसा को बढ़ाता है।
काम अनियंत्रित इच्छाओं के कारण अपराधों को बढ़ावा देता है।
मोह विवेक शक्ति को कमजोर कर निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है।
काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण व्यक्ति सही और गलत के बीच संतुलित निर्णय लेने में असफल हो जाता है। परिणामस्वरूप समाज में विश्वास और सामंजस्य का संकट गहराता जा रहा है।
आभासी दुनिया और बढ़ती मानसिक अशांति
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रतिस्पर्धा, दिखावा और तुलना की प्रवृत्ति ने लोगों के भीतर असंतोष को बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया और आभासी दुनिया की चकाचौंध ने अपेक्षाओं को अवास्तविक बना दिया है। हर व्यक्ति दूसरों की सफलता से अपनी तुलना करता है, जिससे हीन भावना और तनाव उत्पन्न होता है।
तेजी से बदलते जीवन में व्यक्ति के पास स्वयं के लिए समय नहीं है। ध्यान, योग, संवाद और पारिवारिक समय की कमी ने मानसिक संतुलन को प्रभावित किया है। काम, क्रोध, लोभ और मोह का प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। अवसाद, अकेलापन और असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ रही है।
परिवार और शिक्षा की भूमिका
समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस चुनौती का समाधान केवल कानून या दंड से संभव नहीं है। इसके लिए मूल्य आधारित शिक्षा और संस्कारों की पुनर्स्थापना आवश्यक है।
परिवार में बच्चों को नैतिक शिक्षा, संयम और सहानुभूति का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। विद्यालयों में चरित्र निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि बचपन से ही बच्चों को काम, क्रोध, लोभ और मोह पर नियंत्रण का महत्व समझाया जाए, तो आने वाली पीढ़ी अधिक संतुलित और संवेदनशील होगी।
समाज में सकारात्मक संवाद, सामूहिक प्रार्थना, योग और ध्यान जैसे प्रयास भी आंतरिक शांति को बढ़ावा दे सकते हैं। जब व्यक्ति आत्मसंयम और संतोष को अपनाता है, तभी वह वास्तविक सुख का अनुभव कर पाता है।
आधुनिकता और नैतिकता का संतुलन
यह आवश्यक नहीं कि आधुनिकता को त्याग दिया जाए। बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक विकास और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। तकनीक और सुविधाएं जीवन को सरल बनाती हैं, लेकिन जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सफलता नहीं हो सकता।
वास्तविक प्रगति वही है, जिसमें व्यक्ति आंतरिक शांति, संतोष और आत्मविश्वास प्राप्त करे। यदि समाज को स्थायी विकास और सामाजिक सौहार्द की दिशा में आगे बढ़ना है, तो काम, क्रोध, लोभ और मोह पर नियंत्रण की सामूहिक चेतना विकसित करनी होगी।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि मानव जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन में निहित है। आत्मचिंतन, आत्मसंयम और नैतिकता ही वह मार्ग है, जो व्यक्ति को स्थायी सुख और शांति प्रदान कर सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं से प्रश्न करें—क्या हम केवल भौतिक उपलब्धियों के पीछे भाग रहे हैं, या अपने भीतर झांकने का साहस भी रखते हैं? जब तक काम, क्रोध, लोभ और मोह पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक सुख और शांति केवल एक भ्रम बनकर रह जाएंगे।
