Sunday, March 1, 2026
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शहीद शेख भिखारी: गुमनाम नायक, ऐतिहासिक अन्याय और आज के भारत में सांप्रदायिक सद्भाव की ज़रूरत

रांची (राष्ट्र की परम्परा)8 जनवरी 1858 को चुटुपालु घाटी में फांसी पर चढ़ाए गए शहीद शेख भिखारी की पुण्यतिथि हर वर्ष आती है, लेकिन झारखंड में उनकी स्मृति वैसी नहीं दिखती, जैसी एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी को मिलनी चाहिए। 1857 के महान विद्रोह में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध डटकर खड़े रहने वाले शेख भिखारी ने रांची को अंग्रेजी कब्जे से बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे शहीद टिकैत उमराव सिंह के दीवान और कमांडर थे, फिर भी इतिहास की मुख्यधारा में उनका नाम आज भी हाशिये पर है।यह अनदेखी केवल ऐतिहासिक अन्याय नहीं है, बल्कि वर्तमान समय में एक चूक भी है—जब समाज में सांप्रदायिक विभाजन को हवा दी जा रही है और सद्भाव के प्रतीकों की सबसे अधिक आवश्यकता है।1819 में रांची जिले के खुदिया गांव में जन्मे शेख भिखारी 1857 के विद्रोह के समय 38 वर्ष के थे। उन्होंने टिकैत उमराव सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया, चतरा में संघर्ष किया और हजारीबाग जेल से कैदियों को छुड़ाने के प्रयास में भी शामिल रहे। अंततः ब्रिटिश जनरल मैकडोनाल्ड ने उन्हें और टिकैत उमराव सिंह को गिरफ्तार कर फांसी पर चढ़ा दिया। लोककथाओं और जनस्मृतियों में उनकी वीरता जीवित है, लेकिन औपचारिक इतिहास में वे अब भी “अनसंग हीरो” बने हुए हैं।झारखंड में उनके नाम पर कुछ संस्थान अवश्य हैं—जैसे रांची का शहीद शेख भिखारी कॉलेज ऑफ एजुकेशन और हजारीबाग का शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज—लेकिन क्या यह पर्याप्त है? उनके नाम पर न कोई प्रमुख हवाई अड्डा, न विश्वविद्यालय, न ही कोई बड़ा स्टेडियम है।यदि तुलना करें तो बिरसा मुंडा के नाम पर रांची का मुख्य हवाई अड्डा, संग्रहालय, विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थान, स्टेडियम और अनेक सरकारी योजनाएं हैं। सिदो-कान्हू मुर्मू, तिलका मांझी, जयपाल सिंह मुंडा, अल्बर्ट एक्का, नीलांबर-पीतांबर, वीर बुद्धू भगत, विनोद बिहारी महतो और अन्य महापुरुषों को भी राज्य स्तर पर योजनाओं, छात्रवृत्तियों और संस्थानों के माध्यम से सम्मान मिला है। तब प्रश्न उठता है—शेख भिखारी की उपेक्षा क्यों?क्या इसका कारण उनका मुस्लिम होना है? या फिर झारखंड के इतिहास को केवल आदिवासी संघर्षों तक सीमित कर देने की प्रवृत्ति? यह सवाल राज्य सरकार की ऐतिहासिक दृष्टि और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों पर खड़ा होता है। उनके वंशज आज भी पेंशन और रोजगार की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकारी उदासीनता बनी हुई है। 2024 में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी द्वारा उनकी शहादत स्थल पर दी गई श्रद्धांजलि भी एक प्रतीकात्मक घटना बनकर रह गई।आज जब सामाजिक ताने-बाने में दरारें गहरी हो रही हैं, शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह की साझी शहादत हमें याद दिलाती है कि भारत की आज़ादी की नींव सांप्रदायिक एकता पर रखी गई थी। एक मुस्लिम और एक हिंदू योद्धा—दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी और साथ-साथ फांसी का फंदा चूमा।कुछ संगठन और उनके वंशज शहादत दिवस मनाते हैं, लेकिन राज्य स्तर पर यह जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई जाती? झारखंड सरकार को चाहिए कि शेख भिखारी के नाम पर “सद्भावना और वीरता पुरस्कार” की शुरुआत करे, ऐसी सरकारी योजनाएं चलाए जो उनके नाम को जन-जन तक पहुंचाएं और नई पीढ़ी को यह संदेश दें कि देशभक्ति किसी एक धर्म की बपौती नहीं होती।झारखंड, जो बहुलतावादी और संघर्षशील संस्कृति का प्रतीक है, को अपने इतिहास के हर नायक को समान सम्मान देना होगा। यदि शेख भिखारी की अनदेखी जारी रही, तो हम न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी को भूलेंगे, बल्कि उस सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत को भी खो देंगे, जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है।फोकस शब्द: शहीद शेख भिखारीटैग: 1857 का विद्रोह, झारखंड का इतिहास, सांप्रदायिक सद्भाव, गुमनाम नायक, स्वतंत्रता संग्राम

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