कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मनुष्य का शरीर मिट्टी से बना है—नश्वर, सीमित और क्षणभंगुर—लेकिन उसके भीतर विद्यमान चेतना ही उसे अन्य जीवों से अलग पहचान देती है। यही चेतना मनुष्य को सोचने, समझने, प्रश्न करने और सत्य की खोज करने की शक्ति प्रदान करती है। जब मनुष्य अपने अस्तित्व पर विचार करता है, तो उसे एहसास होता है कि उसका संबंध केवल देह तक सीमित नहीं, बल्कि किसी व्यापक और उच्च सत्ता से जुड़ा है, जिसे हम परमात्मा कहते हैं।
परमात्मा किसी मंदिर, मस्जिद या ग्रंथ तक सीमित नहीं है। वह उस आंतरिक चेतना में निवास करता है, जो मनुष्य को करुणा, प्रेम, सत्य और न्याय का मार्ग दिखाती है। जब मिट्टी से बना यह शरीर अहंकार, लोभ और स्वार्थ में उलझ जाता है, तब चेतना क्षीण हो जाती है। वहीं सेवा, त्याग और सत्कर्म को अपनाने से उसी चेतना में परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
आज का मनुष्य विज्ञान और तकनीक की ऊंचाइयों पर पहुंच चुका है, लेकिन भीतर से वह अक्सर खालीपन महसूस करता है। भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में वह यह भूलता जा रहा है कि चेतना का पोषण ही सच्चा विकास है। बाहरी प्रगति ने सुविधाएं तो दी हैं, पर आंतरिक शांति को प्रभावित किया है। ऐसे समय में यह समझना जरूरी हो जाता है कि परमात्मा की खोज बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर करनी चाहिए।
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जब मनुष्य स्वयं को केवल मिट्टी का पुतला मानता है, तो उसका जीवन सीमित हो जाता है। लेकिन जैसे ही वह अपने भीतर की चेतना को पहचानता है, वह परमात्मा से जुड़ जाता है। यही चेतना उसे मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध कराती है।
अंततः, मिट्टी का मनुष्य तभी सार्थक होता है, जब वह अपनी चेतना को जाग्रत रखता है। शरीर भले ही मिट्टी में मिल जाए, लेकिन चेतना ही वह दीपक है, जिसमें परमात्मा का प्रकाश सदैव प्रज्वलित रहता है।
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