पुनीत मिश्र
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने समय-समय पर ऐसे महापुरुष दिए, जिन्होंने साधना को सीमित आश्रमों और ग्रंथों से निकालकर जन-जीवन से जोड़ा। महर्षि महेश योगी ऐसे ही युगद्रष्टा थे, जिन्होंने ध्यान को रहस्य नहीं, बल्कि जीवन-शैली बनाया। महर्षि मुक्त विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में उन्होंने शिक्षा, अध्यात्म और विज्ञान के बीच सेतु स्थापित किया और चेतना के विकास को मानव कल्याण का केंद्र बनाया।
महर्षि महेश योगी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि आंतरिक शांति ही बाह्य उन्नति की आधारशिला होती है। उन्होंने पारंपरिक वैदिक ज्ञान को आधुनिक भाषा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि जब व्यक्ति की चेतना विकसित होती है, तभी समाज और राष्ट्र सशक्त बनते हैं। इसी सोच ने उन्हें ट्रान्सेंडेंटल मेडिटेशन (भावातीत ध्यान) जैसी सरल, प्रभावी और सार्वभौमिक पद्धति के प्रचार के लिए प्रेरित किया।
उनकी साधना-परंपरा का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह था कि उन्होंने ध्यान को किसी संप्रदाय, जाति या देश की सीमा में नहीं बांधा। विश्व के अनेक देशों में उन्होंने यह संदेश दिया कि ध्यान किसी धर्म विशेष का नहीं, बल्कि मानव मात्र की आवश्यकता है। आज विश्व के कोने-कोने में लाखों लोग उनके द्वारा प्रतिपादित ध्यान पद्धति से मानसिक संतुलन, रचनात्मकता और स्वास्थ्य का अनुभव कर रहे हैं।
महर्षि मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना भी इसी दूरदृष्टि का परिणाम है। यह विश्वविद्यालय केवल डिग्रियां देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का केंद्र है। यहां शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूर्ण मानव का निर्माण है। ऐसा मानव जो ज्ञान, करुणा, संतुलन और जिम्मेदारी से युक्त हो। महर्षि महेश योगी का स्पष्ट मत था कि शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह विद्यार्थी के अंतर्मन को जाग्रत करे।
महर्षि महेश योगी ने विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद स्थापित कर यह सिद्ध किया कि दोनों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उन्होंने यह विचार दिया कि चेतना का अध्ययन भी उतना ही वैज्ञानिक हो सकता है, जितना भौतिक जगत का। इसी कारण विश्व के अनेक वैज्ञानिक, शिक्षाविद और शोध संस्थान उनके विचारों से प्रभावित हुए।
आज उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, आत्ममंथन का भी क्षण है। अशांति, तनाव और प्रतिस्पर्धा से भरे वर्तमान समय में महर्षि महेश योगी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो गया है। भीतर की शांति ही बाहर की व्यवस्था को सुंदर बनाती है। यदि व्यक्ति स्वयं से जुड़ जाए, तो समाज स्वतः सशक्त हो जाता है।
महर्षि महेश योगी का जीवन और विचार हमें यह प्रेरणा देते हैं कि सच्चा परिवर्तन बाहरी सुधारों से नहीं, आंतरिक जागरण से आता है। उनकी जयंती पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम ध्यान, संयम और चेतना-विकास को अपने जीवन का अंग बनाएं और एक शांत, संतुलित व मानवीय विश्व के निर्माण में सहभागी बनें।
