महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मानव इतिहास के प्रत्येक युग में यदि किसी एक मूल्य ने समाज को जोड़कर रखा है, तो वह है—दान। दान केवल किसी को वस्तु या धन देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित करुणा, संवेदना और त्याग का सजीव रूप है। जब आदिम मानव ने समूह में रहना आरंभ किया, तब उसने यह समझ लिया था कि अकेले अस्तित्व संभव नहीं है। साझा करने की इसी समझ ने आगे चलकर दान की संस्कृति को जन्म दिया, जो सभ्यता की नींव बन गई।
धार्मिक ग्रंथों में दान को सर्वोच्च पुण्य माना गया है, लेकिन इसकी सार्थकता केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं है। सामाजिक दृष्टि से दान असमानताओं को कम करने का एक सशक्त माध्यम है। जब समाज का सक्षम वर्ग जरूरतमंद की सहायता करता है, तो इससे विश्वास और सहयोग की भावना विकसित होती है। दान सामाजिक ताने-बाने को मजबूती देता है और मानवीय संबंधों को टूटने से बचाता है।
अक्सर दान को केवल धन से जोड़कर देखा जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। ज्ञान दान से समाज में जागरूकता आती है, समय दान से किसी के जीवन की दिशा बदल सकती है। रक्तदान और अंगदान किसी को नया जीवन देने का माध्यम बनते हैं। एक शिक्षक का निःस्वार्थ समर्पण, एक चिकित्सक की सेवा भावना या किसी युवा का समाजसेवा में योगदान—ये सभी दान के ही विभिन्न स्वरूप हैं।
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मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से भी यह स्पष्ट होता है कि देने से व्यक्ति को आत्मसंतोष और मानसिक शांति प्राप्त होती है। प्रकृति ने मनुष्य को इस प्रकार गढ़ा है कि वह केवल लेने में नहीं, बल्कि देने में भी आनंद अनुभव करता है। यही कारण है कि दान केवल प्राप्तकर्ता के लिए नहीं, बल्कि दाता के लिए भी कल्याणकारी होता है।
वर्तमान समय में भौतिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच दान की भावना कहीं न कहीं कमजोर पड़ती दिखाई देती है। फिर भी इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन समाजों में त्याग, सहयोग और साझा करने की परंपरा मजबूत रही, वे अधिक स्थायी और समृद्ध बने। दान केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय चेतना का प्रतीक है।
मानव सृष्टि भावनाओं और रिश्तों का एक विस्तृत जाल है। इस जाल को मजबूती देने वाली सबसे सशक्त कड़ी दान ही है। जब तक देने की संस्कृति जीवित है, तब तक मानवता सुरक्षित है और सभ्यता सशक्त बनी रहती है।
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