🌿 सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग में शिकारियों का आतंक: कछुआ–नेवला समेत दुर्लभ जीव तस्करी के निशाने पर — वन विभाग मौन!
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग में इस समय वन्यजीवों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। कभी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध यह इलाका अब शिकारियों और वन्यजीव तस्करों का अड्डा बनता जा रहा है। पकड़ी वन रेंज के जगपुर बीट, बागापार, बेलहिया और सड़कहियां जैसे इलाके इन दिनों अवैध शिकार की घटनाओं से दहले हुए हैं।
स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, एक संगठित तस्कर गिरोह ग्रामीण इलाकों में सक्रिय है जो कछुआ, नेवला और अन्य संरक्षित प्रजातियों के जीवों का शिकार कर उन्हें नेपाल के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक तस्करी करवा रहा है। यह नेटवर्क इतना मजबूत है कि हर स्तर पर इसके कनेक्शन फैले हैं — स्थानीय दलालों से लेकर विदेशी खरीदारों तक।
रात के अंधेरे में ये शिकारी नदियों और जंगलों के किनारे जाल बिछाकर कछुए और नेवले जैसे संरक्षित जीवों को पकड़ लेते हैं। पकड़े गए जीवों को तस्करी चैनल के माध्यम से नेपाल और चीन तक भेजा जाता है। जानकार बताते हैं कि कछुए के कवच, मांस और नेवले की खाल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी मांग है, जिससे तस्कर हर महीने लाखों रुपये कमा रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह नदारद दिख रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग के अधिकारी इन गतिविधियों से या तो अनजान बने हुए हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कछुआ और नेवला दोनों संरक्षित प्रजातियों में शामिल हैं और इनके शिकार या व्यापार पर सख्त प्रतिबंध है। बावजूद इसके, जिले में यह अवैध कारोबार खुलेआम जारी है।
पर्यावरण प्रेमियों और समाजसेवियों ने वन विभाग से त्वरित कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सोहगीबरवां प्रभाग से दुर्लभ वन्यजीवों का अस्तित्व समाप्त हो सकता है।
वहीं, जब पकड़ी वन रेंज के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने किसी भी प्रकार की जानकारी होने से इंकार कर दिया।
अब बड़ा सवाल यही है — आखिर वन विभाग इन संगठित तस्करों पर कार्रवाई कब करेगा? क्या तब, जब जंगलों से जीवन की अंतिम आवाज भी खो जाएगी?
