हाथ जोड़कर ये वोट माँगते नेता,
विजयी होकर माननीय बन जाते हैं,
इनकी अपनी डफली बजती फिर,
ये केवल अपना ही राग सुनाते हैं ।
भक्तों को प्रसाद मिला न मिला,
चमचों की बात सुना, नहीं सुना,
रामा देवी जी हों, वृजभूषण जी हों,
इनको बस जनता को धोखा देना।
नेताओं की ज़्यादा भक्ति करना,
या इन सबकी चमचागीरी करना,
खुद अपने को ही धोखे में रखना है,
नहीं किसी को इन्होंने कुछ भी देना है।
इनकी ख़ातिर अपनी मित्रता के रिश्ते,
ना जाने हम खुद क्यों बिगाड़ लेते हैं,
हममें से किसी के ये नहीं सगे होते हैं,
वोटबैंक के लिए सारे दंडफंड करते हैं।
इनकी खुद की झोलियाँ भर जायें,
इनको बस लूट से मतलब होता है,
भूखा नंगा हो कोई इन्हें फ़र्क़ नहीं होता,
नेतानगरी का कोई सगा नहीं होता।
वेतन पेंशन साथ लेते, हमको क्या देते हैं,
वेतन महंगाई के पैसे भी चटकर जाते हैं,
आदित्य वोट दे, अपना कर्तव्य निभाना है,
इनके चक्कर से दूर दूर ही हमको रहना है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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