दीप हूं मैं,दुश्मनी मेरी          अंधेरों से सदा से         
व्यर्थ ही यह हवा मुझसे          बाहुबल है आजमाती।
भोर लाने के लिए संघर्ष 
मेरा अनवरत है 
बूंद अन्तिम तैल की 
तम से लड़ेगी भीष्म व्रत है 
राख जबतक हो न जाए
बुझ सकेगी नहीं बाती।                  जानता हूं देह मुझको                  विधाता ने दिया माटी                  किन्तु पर हित में सदा                  बहुमूल्य सारी उम्र काटी                  सांझ हर मुस्कान मेरी                  जागरण के गीत गाती।
तानकर सीना अमावस से 
अंधेरे में खड़ा हूं 
नील नभ के वक्ष में
मैं किसी तारे सा जड़ा हूं
भले नश्वर किन्तु दुनिया
गीत मेरे गुनगुनाती।                करूं क्या चिन्ता,विधाता ने                दिया अमरत्व मुझको                सृष्टि का वरदान ही है                रोशनी सा तत्व मुझको                तपा मेरी यश: काया                निशा तम से मुक्ति पाती। 
 -शिवाकांत मिश्र 'विद्रोही' गोंडा

rkpnews@desk

Recent Posts

प्याज-चीनी की महंगाई से बढ़ी रसोई की चिंता, क्या बफर स्टॉक बनेगा किसान-उपभोक्ता संतुलन का समाधान?

रसोई में महंगाई का तड़का: प्याज 70 रुपये पार, चीनी की तेजी ने बढ़ाई चिंता;…

19 minutes ago

औद्योगिक भ्रमण में विद्यार्थियों ने समझी उद्योग जगत की कार्यप्रणाली

बिछुआ (राष्ट्र की परम्परा)। कक्षा में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को उद्योग जगत की वास्तविक…

3 hours ago

राखी का संदेश

✍️ विजय गुंजन स्नेह है, अनुराग है, पवित्रता का बंधन है,ममता भरे एक धागे का…

4 hours ago

रक्षा बंधन: रिश्तों की डोर से राष्ट्र की परम्परा तक

नवनीत मिश्र रक्षा बंधन केवल कलाई पर राखी बांधने का पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन के…

14 hours ago

रॉयल्टी के छह गुना दंड से परेशान पीडब्ल्यूडी ठेकेदार, कार्य बहिष्कार की तैयारी

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। लोक निर्माण विभाग, उत्तर प्रदेश के ठेकेदार रॉयल्टी से जुड़े मामलों…

17 hours ago

भाई-बहन का स्नेहाकाश

✍️ संजय एम. तराणेकर कलाई पर बंधता धागा है,पर बंधता है उससे विश्वास,बहन की आँखों…

21 hours ago