गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जुलाई 2026 का मानसून सत्र केवल राजनीतिक टकराव के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों की संवैधानिक स्थिति को लेकर शुरू हुई एक नई बहस के कारण भी लंबे समय तक याद किया जा सकता है।20 जुलाई 2026 को जब यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया,उसी समय विपक्ष ने इसके विरोध में तीखी आपत्ति दर्ज कराई।विभिन्न विपक्षी दलों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए अन्य तात्कालिक मुद्दों पर चर्चा की मांग की।सदन में लगातार हंगामा होता रहा और विधेयक पर विस्तृत चर्चा प्रारंभ नहीं हो सकी।21 जुलाई 2026 तक की संसदीय स्थिति के अनुसार यह विधेयक प्रस्तुत तो हो चुका था, किंतु उस पर विचार- विमर्श और आगे की विधायी प्रक्रिया गतिरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। अर्थात विधेयक अभी कानून नहीं बना है और उसे संसद के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करना शेष है।केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ने संसद से लेकर न्यायपालिका,संविधान विशेषज्ञों,राजनीतिक दलों, शिक्षाविदों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक व्यापक चर्चा को जन्म दिया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि प्रस्तावित संशोधन का मूल उद्देश्य राष्ट्रगीत वंदे मातरम को वही वैधानिक संरक्षण प्रदान करना है जो अब तक राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान जन गण मन को प्राप्त है।यदि यह विधेयक वर्तमान स्वरूप में कानून बनता है तो किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर वंदे मातरम का अपमान करना, उसके गायन में बाधा डालना अथवा सार्वजनिक कार्यक्रम में उसका अनादर करना तीन वर्ष तक के कारावास जुर्माने या दोनों से दंडनीय अपराध बन सकता है। यहीं से वह संवैधानिक प्रश्न प्रारंभ होता है जिसने पूरे देश में चर्चा को जन्म दिया है,क्या यह राष्ट्रीय सम्मान को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है?,या फिर यह देशभक्ति को कानून के माध्यम से अनिवार्य बनाने का प्रयास माना जाएगा?
साथियों, मीडिया में आई जानकारी के अनुसार सरकार का पक्ष अत्यंत स्पष्ट है। केंद्र का कहना है कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी गीत को प्रेरणा का स्रोत बनाया। अनेक क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते समय वंदे मातरम का उद्घोष करते थे। संविधान सभा के अंतिम चरण में 24 जनवरी 1950 को तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा जबकि वंदे मातरम को समान सम्मान प्राप्त रहेगा। सरकार का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए अब समय आ गया है कि इसे भी वैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति जानबूझकर इसका अपमान न कर सके। सरकार यह भी कह रही है कि यह संशोधन किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि सटीकता से राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए लाया गया है।
साथियों, यह विधेयक वास्तव में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में संशोधन का प्रस्ताव है। वर्तमान अधिनियम मुख्य रूप से राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडनीय बनाता है। प्रस्तावित संशोधन के बाद पहली बार राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाएगा। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान करता है, उसके गायन में व्यवधान उत्पन्न करता है, किसी सार्वजनिक समारोह में उसे रोकने का प्रयास करता है या उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधि करता है, तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन केवल जानबूझकर किए गए अपमान पर लागू होगा, यह सटीकता से सामान्य परिस्थितियों अथवा व्यक्तिगत विवेक पर नहीं।
साथियों, लेकिन यही वह बिंदु है जहां से संवैधानिक विवाद प्रारंभ होता है। विपक्ष का कहना है कि संविधान सभा ने जानबूझकर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बीच कानूनी अंतर बनाए रखा था। यदि संविधान निर्माताओं की मंशा दोनों को समान कानूनी दर्जा देने की होती तो संविधान में उसी समय इसका स्पष्ट उल्लेख किया जाता। विपक्षी दलों, विशेषकर सीपीआई (एम), का आरोप है कि सरकार संविधान सभा की मूल भावना को बदलने का प्रयास कर रही है। उनके अनुसार देशभक्ति एक भावनात्मक और नैतिक मूल्य है, जिसे कानून के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि किसी नागरिक के व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वास के कारण वह राष्ट्रगीत नहीं गाना चाहता, तो उसे अपराधी नहीं बनाया जा सकता।
साथियों, सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की मांग की। पत्र में कहा गया कि संविधान सभा ने बहुत सोच-समझकर राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की अलग- अलग संवैधानिक स्थिति निर्धारित की थी। पत्र में यह भी कहा गया कि भारत का संविधान नागरिकों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में किसी गीत को कानून के माध्यम से अनिवार्य सम्मान दिलाने का प्रयास भविष्य में संवैधानिक विवादों को जन्म दे सकता है। विपक्ष का तर्क है कि राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय अनिवार्यता के बीच सटीकता से संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। वंदे मातरम मूलतः बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा है। गीत के प्रारंभिक दो अंतरे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, जबकि बाद के अंशों में मां दुर्गा सहित कुछ धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख मिलता है। इतिहास में कई मुस्लिम संगठनों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने इन्हीं धार्मिक संदर्भों के आधार पर इसके पूर्ण गायन पर आपत्ति व्यक्त की थी। संविधान सभा ने भी इन ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए केवल प्रारंभिक अंशों को सार्वजनिक उपयोग के लिए स्वीकार किया था। आलोचकों का कहना है कि यदि इस विधेयक के बाद किसी नागरिक की धार्मिक मान्यता और कानून के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो न्यायपालिका को अत्यंत जटिल संवैधानिक प्रश्नों का सटीकता से सामना करना पड़ सकता है।
साथियों, इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का 1986 का ऐतिहासिक निर्णय बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य बार-बार चर्चा में आ रहा है। इस मामले में यहोवा विटनेस समुदाय के तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, हालांकि वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे। विद्यालय ने उन्हें निष्कासित कर दिया,लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी नागरिक को उसकी अंतरात्मा के विरुद्ध राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि वह सम्मानपूर्वक खड़ा है और राष्ट्रगान का अपमान नहीं कर रहा, तो केवल गीत न गाने के आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भारतीय संवैधानिक कानून में अंतरात्मा की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यही कारण है कि कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नया संशोधन कानून बनता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित है। मार्च 2026 में भी इस विषय पर न्यायिक चर्चा हुई थी। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में वंदे मातरम बजाया जाता है तो केवल उसके बजने मात्र से प्रत्येक नागरिक पर उसे गाना अनिवार्य नहीं हो जाता। सम्मान प्रदर्शित करना और अनिवार्य रूप से गाना दो अलग-अलग बातें हैं। यह दृष्टिकोण भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है क्योंकि नया संशोधन और न्यायालय की पूर्व व्याख्याएं भविष्य में एक-दूसरे के साथ किस प्रकार संतुलित होंगी, यह अभी सटीकता से स्पष्ट नहीं है।
साथियों,संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 25 अंतरात्मा तथा धर्म की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। दूसरी ओर अनुच्छेद 51ए (क) प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य बताता है कि वह संविधान,राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। उल्लेखनीय है कि इस अनुच्छेद में वंदे मातरम’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यही कारण है कि कई विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संसद राष्ट्रगीत को वैधानिक संरक्षण देना चाहती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि यह संरक्षण मौलिक अधिकारों के साथ किस प्रकार संतुलित रहेगा।समर्थकों का तर्क है कि विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान है। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान की कानूनी सुरक्षा उचित मानी जाती है तो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक गीत को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्यों से भी मजबूत होती है। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल विविधता, सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है, इसलिए राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करते समय संवैधानिक स्वतंत्रताओं का भी समान महत्व होना चाहिए।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है क्या देशभक्ति कानून से उत्पन्न होती है या सामाजिक चेतना से? भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताता है कि वंदे मातरम और जन गण मन दोनों ने अलग-अलग समय में राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। किंतु संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी समान महत्व दिया। इसलिए भविष्य की किसी भी कानूनी व्यवस्था को इन दोनों मूल्यों के बीच सटिकता से संतुलन स्थापित करना होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी यह बहस महत्वपूर्ण है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन लगातार न्यायालयों के सामने चुनौती बना रहता है। भारत का यह प्रस्तावित संशोधन भी संभवतः इसी व्यापक वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनेगा कि राष्ट्रीय पहचान की रक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच सर्वोत्तम संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 केवल एक दंडात्मक कानून का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों राष्ट्रीय सम्मान,संवैधानिक स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा भी है। यदि विधेयक कानून बनता है तो उसके प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित मानी जा रही है। वहीं यदि संसद में व्यापक सहमति बनती है तो यह राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। परंतु यदि सहमति नहीं बनती, तो यह बहस आने वाले वर्षों तक संविधान,न्यायपालिका संसद और समाज के बीच चलने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विमर्शों में से एक बनी रह सकती है। भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में यही चुनौती है कि राष्ट्रीय गौरव की रक्षा भी हो, संविधान की आत्मा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
