✍️ कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मुझे किसी बात का घमंड नहीं। जीवन ने इतना कुछ सिखा दिया है कि अब न दर्द पर हैरानी होती है, न अकेलेपन से डर लगता है। लोग कहते हैं—मेरी जबान कड़वी है। पर सच तो यह है कि शहद में जहर घोलना मेरे बस की बात नहीं। साफ बात कहना ही मेरी पहचान है, और शायद इसी कारण मेरा किरदार हर किसी को भाता नहीं।
विधाता ने दर्द के सैलाब में पाला, मुश्किलों की आग में तपाया, और रंज-ओ-गम के मेले में अकेले चलने की हिम्मत दी। अब तन्हाई भी साथी है—न किसी के आने पर खुशी, न किसी के जाने पर गम। यह सोचकर मन बदल गया कि इस संसार में कुछ भी अपना नहीं, बस स्वार्थ का मेला लगा है। हर कदम पर इम्तिहान, हर कदम पर खेल।
लेकिन सवाल यह है—इंसान इतनी चाहतों और झूठे गुमान में डूब क्यों जाता है, जबकि उसे पता है यह जीवन स्थाई नहीं? महज कुछ दिन का पड़ाव है। आया है, सो जाएगा—राजा, रंक, फकीर सभी। इसलिए जितने दिन मिले हैं, उन्हें परमार्थ और मानवता की सेवा में लगा दो। यही कमाई पारलौकिक संसार में काम आएगी।
यह नश्वर संसार मोह-माया का भ्रम जाल है। हर कोई लक्ष्मी को बंधक बनाने में व्यस्त है जबकि खुद मिट्टी की काया में कैद है, जिसका अंत निश्चित है। प्रारब्ध, परिवर्तन और कर्म-फल—सब पूर्व लिखित। फिर भी स्वार्थ की अंधी दौड़ जारी है। मौत साथ चलती है, पर इंसान गाफिल ही रहता है।
अवतरण दिवस से ही उलटी गिनती शुरू हो जाती है। एक दिन ऐसा आता है जब जीवन- यात्रा के आख़िरी पन्ने पर रुखसती का फरमान जारी कर दिया जाता है—बिना सुनवाई, बिना अपील। सब कुछ छोड़कर जाना होता है, यह नियति का अंतिम आदेश है। और जैसे ही चिता की लपटों में देह पंचतत्व में विलीन होती है, दुनिया कुछ पल रोकर सब भूल जाती है—क्योंकि स्वार्थ ही उसका आधार है।
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हम रोज मौत को पास से गुजरते देखते हैं, फिर भी सच को स्वीकार नहीं करते। ख्वाहिशों, घमंड और झूठे रुआब की भूख इंसान को आखिरी सांस तक अंधा बनाए रखती है। जबकि समय हमें उस मुकाम तक ले आता है जहां सारी गिनतियां शून्य में समा जाती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि इस अभिषप्त जीवन को इंसानियत के उपवन में बदलें—जहां प्रेम, करुणा और भाई-चारे के फूल खिल सकें। ताकि जब आत्मा देह त्यागे, तो नव प्रवाह में परमात्मा से मिलन का मार्ग सुगम हो सके।
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