ईश्वर के द्रोही सतयुग से लेकर
त्रेता, द्वापर, कलियुग में भी हैं,
सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई,
पहले भी थीं और आज भी हैं।
वाद-विवाद, तर्क-वितर्क भी थे,
आज भी हैं, परंतु कुछ ज़्यादा हैं,
शास्त्रार्थ नहीं अब गाली-गलौज,
ईर्ष्या-द्वेष, क्रोध, अहंकार फैले हैं।
श्री राम नाम की मर्यादा तज कर,
श्री राम नाम का फ़ायदा उठाते हैं,
धर्म सुरक्षा की ख़ातिर अब अधर्म,
अनाचार, भ्रष्टाचार के गाने गाते हैं।
मानव ही मानव से जलता है,
आग लगाने की नहीं ज़रूरत है,
गर्मी हो, सर्दी हो या वारिस हो,
दिलों की जलन बेमुरऊवत है।
आज बड़े बुजुर्गों काअपमान,
युवा वर्ग की शान में शामिल,
नेता, मंत्री से लेकर संत्री तक
सब अहंकार से रहते हैं ग्रसित।
अपनी इज़्ज़त बचा बचा कर,
बुजुर्ग सब घुट घुट कर जीते हैं,
आदित्य राजनीति जहाँ दूषित,
कलियुग में सतयुग लाये कहते हैं।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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