
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी आगामी सप्ताह में अल्जीरिया की आधिकारिक यात्रा पर रवाना होंगे। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा है, जिसे भारत की वैश्विक रणनीतिक सक्रियता का संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दौरा न केवल द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को गहरा करेगा, बल्कि अफ्रीका–भूमध्यसागर क्षेत्र में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूत करेगा।
हालिया उच्च स्तरीय संपर्कों की कड़ी
जनरल द्विवेदी की यह यात्रा उस कूटनीतिक सिलसिले को आगे बढ़ाएगी, जिसकी नींव हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान की अल्जीरिया यात्राओं ने रखी थी। इन दौरों के दौरान रक्षा, ऊर्जा और शिक्षा सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी थी। सेना प्रमुख का दौरा इस सहमति को व्यवहारिक आयाम देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भारत–चीन प्रतिस्पर्धा की पृष्ठभूमि
अल्जीरिया की यह यात्रा केवल एक औपचारिक सैन्य कार्यक्रम नहीं बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा है। चीन बीते एक दशक से अफ्रीका और भूमध्यसागर क्षेत्र में निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऋण परियोजनाओं के जरिए गहरी पैठ बना चुका है। इसके बरक्स भारत रक्षा सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ऊर्जा साझेदारी के जरिए क्षेत्र में अपनी विश्वसनीय उपस्थिति दर्ज कराने की रणनीति अपना रहा है।
साझेदारी से संतुलन और स्थिरता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अल्जीरिया के बीच बढ़ता सहयोग न केवल चीन के प्रभाव को संतुलित करेगा, बल्कि अफ्रीका में भारत की विदेश नीति को नई दिशा भी देगा। इस साझेदारी से दोनों देश साझा सुरक्षा चुनौतियों—जैसे आतंकवाद, समुद्री डकैती और ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षा—पर मिलकर काम कर पाएंगे। साथ ही ऊर्जा, शिक्षा और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते भी खुलेंगे।
भविष्य की राह
जनरल द्विवेदी का यह दौरा भारत की बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है। अब भारतीय सेना केवल घरेलू सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक साझेदारी में सक्रिय भूमिका निभा रही है। अल्जीरिया यात्रा से भारत–अफ्रीका संबंधों में नई ऊर्जा आएगी और साझा विकास तथा स्थिरता की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।