बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। पूर्णिमा से कल्पवास शुरू हो जाता है। मान्यता है कि माघ मास में एक महीने संगम तट पर नियम संयम से जीवन व्यतीत करने को कल्पवास कहते हैं। माघ महीना बहुत पवित्र महीना होता है। इस महीने में अनेक धार्मिक पर्व आते हैं। माघ महीने में तीर्थ स्नान सूर्य देव मां गंगा और श्री हरि विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। कल्पवास पौष माह की पूर्णिमा से लेकर माघ माह की पूर्णिमा तक किसी पवित्र भूमि या स्थान पर रहकर भगवद- चिंतन में समय व्यतीत करने को कहा जाता है। वैसे तो कल्पवास के लिए कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं है। फिर भी कहा जाता है कि उम्र के अंतिम पड़ाव पर होने के साथ जिम्मेदारियों से भी मुक्त होकर ही कल्पवास करना चाहिए। कल्पवास में भक्त प्रयाग के संगम तट पर एक महीना डेरा डालकर नियम संयम से रहते हैं कुछ लोग मकर संक्रांति से भी कल्पवास करते हैं। कल्पवास के द्वारा श्रद्धालु एक महीना आध्यात्मिक साधना करते हैं। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को इच्छित फल प्राप्त होने के साथ-साथ जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्ति मिलती है। महाभारत के अनुसार 100 साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने के बराबर फल माघ मास में कल्पवास करने से मिलता है। ऐसा माना जाता है कि कल्पवास का पालन करने से अंतःकरण और शरीर दोनों का शुद्धिकरण हो जाता है। कल्पवास करने वाला व्यक्ति अपने रहने के स्थान पर जौ का बीज रोपता है और पहले दिन से ही तुलसी और शालिग्राम की पूजा शुरू हो जाती है सर्दी के मौसम में गंगा यमुना और सरस्वती के मिलन स्थल पर कल्पवास करने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। बदलते समय के साथ-साथ कल्पवास के तौर तरीकों में भी बदलाव आए हैं। बुजुर्गों के साथ-साथ युवा भी कल्पवास करने लगे हैं। कुछ विदेशी भी अपने गुरुओं के सानिध्य में रहकर कल्पवास करते हैं। कल्पवास के दौरान कल्प वासी को जमीन पर शयन करना होता है और एक समय भोजन तथा एक समय फलाहार किया जाता है कल्पवासी व्यक्ति को तीन समय गंगा स्नान करने की परंपरा है। कल्पवास 12 वर्षों तक किया जाता है इससे कम या ज्यादा भी कर सकते हैं। संगम की रेती पर हर साल माघ मेले का आयोजन होता है 6 वर्षों में कुंभ मेला तथा 12 वर्षों में महाकुंभ मेले का आयोजन होता है संगम नगरी में लगने वाला माघ मेला सनातन धर्म का सबसे बड़ा मेला है।
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