न कहीं ख़ुशी बिक रही है,
न रंजोगम ही बिक रहा है,
व्यर्थ में हम भ्रम पाल बैठे हैं,
कि शायद मरहम लग रहा है।
इच्छाओं में बंधे फँसे पक्षियों
की तरह ऊँचे से ऊँचे उड़ रहे हैं,
इन्ही इच्छाओं में घायल भी हैं,
इन्ही इच्छाओं पर ज़िंदा भी हैं।
अधजगी नींद के सुहाने सपने,
यह कभी अपने कहाँ होते हैं,
करवट बदलते ही यह सभी,
जैसे लुप्त हो जाने लगते हैं।
धैर्य का जल जिस निर्जन
उपवन को मिल जाता है,
प्रफुल्लित पुष्पों से वह,
उसे वाटिका बना देता है।
अहंकार व निरर्थक भ्रम इन्सान
को रिश्तों से अलग कर देते हैं,
अहंकार सच सुनने नही देता है,
व्यर्थ भ्रम सच देख नहीं पाता है।
अहंकार में तीनों चले जाते हैं,
यश और वैभव के साथ वंश भी,
आदित्य न मानो तो देख ना लो,
यूँ ही गये रावण, कौरव, कंस भी।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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