तेल-डॉलर समीकरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट
— प्रभात पटनायक
अमेरिका और इज़राइल की सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो गई है। इस घटनाक्रम ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में धकेल दिया है। तेल की कीमतें डॉलर के मुकाबले तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे एशियाई समेत कई मुद्राओं का अवमूल्यन हुआ है और मुद्रास्फीति का दबाव खासकर विकासशील देशों में तीव्र हो गया है।
मुद्रास्फीति सीधे तौर पर लोगों की क्रय शक्ति को कमजोर करती है। इसका परिणाम यह होता है कि मांग घटती है और अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ने लगती है। परिधीय अर्थव्यवस्थाओं—यानी विकासशील और गरीब देशों—पर इसका प्रभाव और अधिक गंभीर होता है। तेल संकट के कारण उर्वरकों की उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है, जिससे खाद्य उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है और वैश्विक दक्षिण के मेहनतकश वर्ग की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
यह स्थिति इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि इस संकट की जड़ में जारी युद्ध का कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आता। यह युद्ध न केवल राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहा है, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन को भी झकझोर रहा है।
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विडंबना यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में तेल का प्रत्यक्ष योगदान बहुत कम है—2023 में यह वैश्विक जीडीपी का मात्र 2.3% था। इसके बावजूद इसका प्रभाव अत्यधिक व्यापक है। इसका कारण यह है कि तेल एक “सार्वभौमिक मध्यस्थ” की भूमिका निभाता है। विनिर्माण से लेकर परिवहन और कृषि तक लगभग हर क्षेत्र तेल पर निर्भर है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कच्चे माल का मूल्य भले ही कम हो, लेकिन उनके बिना उत्पादन संभव नहीं है। तेल की कीमत में वृद्धि का प्रभाव कई “स्तरों” से गुजरते हुए अंतिम उत्पादों तक पहुंचता है, जिससे महंगाई का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। जितने अधिक स्तर होंगे, कीमतों में वृद्धि का असर उतना ही अधिक होगा।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डॉलर, जो दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा है, अप्रत्यक्ष रूप से तेल से जुड़ा हुआ है। इसे “तेल-डॉलर मानक” कहा जा सकता है। इसका मतलब यह है कि डॉलर की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि तेल की कीमतें लंबे समय तक अनियंत्रित रूप से न बढ़ें।
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अमेरिका के दशकों से जारी भुगतान घाटे के कारण दुनिया में डॉलर की अधिकता हो चुकी है। इन डॉलरों का मूल्य बनाए रखने के लिए जरूरी है कि तेल की कीमतों में स्थिरता बनी रहे। यही कारण है कि अमेरिका तेल उत्पादक देशों पर राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।
खाड़ी देशों पर उसका प्रभाव पहले से मौजूद है, और ईरान व वेनेजुएला को भी अपने दायरे में लाने की रणनीति इसी का हिस्सा रही है। हालांकि, ईरान के मामले में यह रणनीति उलटी पड़ती दिख रही है। मौजूदा संकट ने तेल की कीमतों को अस्थिर कर दिया है, जिससे डॉलर की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह स्थिति न केवल आर्थिक अस्थिरता को जन्म दे रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर असंतोष भी बढ़ा रही है। यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो यह असंतोष बड़े सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का रूप ले सकता है।
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