Thursday, February 26, 2026
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हिन्दी समन्वय व समरसता की भाषा है: प्रो. कमलेश गुप्त

प्रो.कमलेश गुप्त ने ग्रहण किया हिन्दी विभागाध्यक्ष का कार्यभार

हिन्दी सप्ताह के अंतर्गत कार्यक्रम आयोजित

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा तथा पत्रकारिता विभाग में प्रो.कमलेश कुमार गुप्त ने मंगलवार को विभागाध्यक्ष का कार्यभार पूर्व अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी से ग्रहण कर लिया। इस अवसर पर पूरा विभाग उपस्थित रहा। विभिन्न विभागों के आचार्यों ने बधाई व शुभकामनाएं दीं
इसी के साथ ‘हिन्दी सप्ताह’ के अंतर्गत एक कार्यक्रम का प्रो.अनिल राय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।
प्रो. राय ने कहा कि हिन्दी को लेकर दो दृष्टियां मौजूद हैं, एक तरफ हिन्दी के उत्तरोत्तर प्रगति व विकास की, तो दूसरी तरफ बाधाओं, संकटों व समस्याओं की दृष्टि निरंतर विद्यमान है। दोनों दृष्टियों के पर्याप्त तथ्य हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मन में अंग्रेजी के प्रति गहरा सम्मोहन भी काम करता है। जरुरत है हिन्दी को अधिकाधिक अनुवाद के माध्यम से ज्ञान की भाषा बनाने की।
हिन्दी विभाग के नवागत अध्यक्ष प्रो.कमलेश कुमार गुप्त ने कहा कि भारत को दुनियां की ज्ञान परंपरा से निरंतर आदान-प्रदान करते रहने की जरुरत है। हिन्दी उस समन्वय व समरसता की भाषा है जो भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता है। उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि हिन्दी, राजभाषा की भूमिका में आज भी वैसी दिख नहीं रही, जैसी होनी चाहिए। हिन्दी विभाग से इतर अन्य अनुशासनों के लोग जब हिन्दी को अपनी भाषा में स्वीकार करेंगे, ज्ञान विज्ञान की भाषा के रूप में व्यवहार करेंगे, तब तस्वीर सुदृढ़ होगी।
पूर्व अध्यक्ष प्रो.दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा कि हिन्दी दिवस आत्म मूल्यांकन का दिन है। यह समस्त भारतीय भाषाओं पर चिंतन का दिन है।
प्रो.विमलेश मिश्र ने सम्बोधित करते हुए कहा कि मैं 14 सितम्बर को भारतीय भाषा दिवस ही मानता हूं। जबतक हम दूसरी भाषाओं का सम्मान नहीं करेंगे, तबतक हिन्दी को सम्यक सम्मान मिलना मुश्किल है। हिन्दी जोड़ने वाली भाषा है। हिन्दी सभ्यताओं से संवाद क़ायम करने वाली भाषा है। उन्होंने कहा कि हिन्दी त्रिभुजाकर समस्या में फंसी हुई है, वह समस्या है- स्थानीयता, राष्ट्रीयता और वैश्विकता की।
प्रो. राजेश मल्ल ने कहा कि 11 दिसम्बर के भारतीय भाषा दिवस को भी समारोहपूर्वक मनाना चाहिए।
प्रो. प्रत्यूष दुबे ने कहा कि अपनी भाषा की रक्षा ही असल मायने में सभ्यता, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा है। उन्होंने कहा कि अगर माँ बूढ़ी भी हो जाए, तो भी माँ, माँ होती है। माँ का स्थान कोई दूसरा नहीं ले सकता। भाषा के स्तर पर हिन्दी हमारी माँ है।
कार्यक्रम का संचालन शोध छात्रा सोनी ने किया। विद्यार्थियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। उक्त जानकारी विभाग के आचार्य डा. अभिषेक शुक्ल ने दी है।

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