Categories: कविता

दादा जी का पोता

-डॉ. सत्यवान सौरभ

पोता प्यारा दादा जी का,
बैठे उनके पास।
दिनभर उनसे बातें करता,
हँसता बारह मास।

दादा जी जब बाहर जाते,
पीछे-पीछे जाता।
छोटी-छोटी प्यारी बातें,
सबको खूब सुनाता।

दादा जी की लाठी लेकर,
चलता बनकर राजा।
ऐनक पहन इतराता फिरता,
जैसे कोई ताजा।

कभी घोड़ा दादा बन जाते,
वह पीठी पर चढ़ता।
“चलो-चलो अब तेज़ दौड़ो”,
कहकर खूब उछलता।

दादा-पोते का यह रिश्ता,
सबसे बड़ा खजाना।
प्यार भरा यह सुंदर बंधन,
सबको लगे सुहाना।

Karan Pandey

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