हमारी व्यवहार कुशलता जीवन
का वह दर्पण है, इसका जितना
अधिक सदुपयोग किया जाता है,
जीवन का प्रकाश उतना ही बढ़ता है।
किसी व्यक्ति का मूल्यांकन इससे
तय नहीं होता कि वो क्या है, बल्कि
इस तथ्य से तय होता है कि वह खुद
को क्या बनाने की क्षमता रखता है।
इंसान का स्वभाव उसकी एक कमाई
हुई दौलत होती है, कोई कितना भी
दूर हो, अपने स्वभाव के कारण एक
न एक पल यादों में आ ही जाता है।
हाँ याद अच्छे स्वभाव वाले की भी
और इसके विपरीत बुरे स्वभाव वाले
की भी आती है, क्योंकि दोनो ही गुण
अपनी कमाई हुई दौलत से मिलते हैं।
फिर चाहे वह इंसान हो या फिर
भगवान ही क्यों न हों, जहाँ मर्यादा
पुरुषोत्तम श्रीराम याद आते हैं वहाँ
साथ ही रावण सामने आ जाता है।
और जहाँ श्रीकृष्ण वासुदेव यादों
में आते हैं तो उनके मामा कंस भी
सामने आ जाता है शायद यह भी
ऊपर वाले की मर्ज़ी से ही होता है।
अच्छाई और बुराई शायद एक ही
सिक्के के दो पहलू जैसे ही होते हैं,
आदित्य जहाँ प्रेम का भाव होता है,
दूसरे पहलू में घृणा के भाव होते हैं।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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