जैसे ईश्वर सबको प्रसन्न रखता है,
इसलिए सबपर दया भाव रखता है,
वैसे ही मनुष्य से सब ख़ुश रहते हैं तो
उसे भी सबसे समन्वय रखना होता है।
तब रोटी खाने में स्वादिष्ट होती है,
जब रोटी फुलाकर पकाया जाता है,
खाना पकाने वाले और खाने वालों के
बीच दोनो ओर से प्यार निभाया जाता है।
भोजन करने से पहले भोजन बनाने
वाले का आभार तो करना ही चाहिये,
भोजन बनाने वाले से अधिक खाद्यान्न
जुटाने वाले का आभार करना चाहिये।
और उससे भी अधिक तो अन्न उगाने
वाले का आभार व्यक्त करना चाहिये,
भोजन सदा प्रसन्न हो करना चाहिये,
उन सभी का धन्यवाद करना चाहिये।
कमाने वाले का, बनाने वाले का भी,
उगाने वाले का और इसके लिए जल
अन्न व सुभाषित एवं सारी सामर्थ्य
देने वाले परम पिता परमात्मा का भी।
वह सब पर प्रसन्न रहता है सबकी
ग़लतियों को वही क्षमा भी करता है,
हम सबसे प्रसन्न रहना चाहते हैं,
तो सबकी ग़लतियाँ भुलाना होता है।
ईश्वर के प्रति आस्था व विश्वास
जब इंसान निरंतर बनाये रखता है,
आदित्य तब ईश्वर अपने भक्त को
जीवन में कभी निराश नहीं करता है।
डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र,
‘आदित्य’
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