Sunday, March 15, 2026
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विशाल भारत का भूगोल: दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा के दृष्टिकोण से विशाल भारत का भूगोल: एक स्थानिक-कालिक परिप्रेक्ष्य” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। यह शैक्षणिक आयोजन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। उद्घाटन समारोह विश्वविद्यालय परिसर स्थित महायोगी गुरु श्री गोरक्षनाथ शोध पीठ में आयोजित किया गया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रो. जगदीश सिंह (पूर्व विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग), प्रो. संजीत कुमार गुप्ता (कुलपति, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया) तथा प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह (निदेशक, जी.बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान) उपस्थित रहे। संगोष्ठी के निदेशक प्रो. एस.के. सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि संयोजक डॉ. अंकित सिंह ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।
भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. एस.के. सिंह ने स्वागत संबोधन में कहा कि यह संगोष्ठी केवल अकादमिक विमर्श नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के उस वैभव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है जिसने भूगोल को स्थानिक और कालिक दोनों दृष्टियों से समझने का मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि ‘विशाल भारत’ की अवधारणा केवल मानचित्र की सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह सांस्कृतिक चेतना और भौगोलिक एकात्मता का प्रतीक है।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने अपने संबोधन में कहा कि विश्वविद्यालय शोधार्थियों और शिक्षकों को शोध के लिए लगातार मंच उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियों के दौर में भूगोल के अध्ययन की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ही भूगोल की व्यापक समझ विकसित की जा सकती है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. जगदीश सिंह ने ‘विशाल भारत’ की अवधारणा पर विचार रखते हुए कहा कि राष्ट्र की पहचान केवल भौगोलिक सीमा से नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और संप्रभुता से होती है। उन्होंने शोधार्थियों को प्रेरित किया कि वे इस विमर्श के माध्यम से ‘विकसित भारत’ और राष्ट्र की अवधारणा पर गंभीर अध्ययन करें।
प्रो. संजीत कुमार गुप्ता ने कहा कि विशाल भारत को केवल भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार पर समझना चाहिए। उन्होंने ब्रह्मांडीय भूगोल और संसाधनों के वैश्वीकरण को इस अवधारणा से जोड़ा और कहा कि भारतीय दृष्टि में भूगोल का संबंध संस्कृति और जीवन मूल्यों से भी है।
प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि केवल शहरीकरण पर ध्यान केंद्रित करना और ग्रामीण विकास की उपेक्षा करना संतुलित विकास के लिए घातक है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया तथा कहा कि व्यापक दृष्टि के बिना ‘विशाल भारत’ की कल्पना संभव नहीं है।
मुख्य अतिथि डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि ‘विशाल भारत’ का अर्थ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि नैतिक और प्राकृतिक दृष्टि से भी उसकी विशालता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य प्रकृति के संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहा है। जीवन के लिए मिट्टी, जल और वायु की रक्षा अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि प्रकृति को बचाने की नहीं, बल्कि स्वयं को बचाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. श्रीप्रकाश सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र (प्लेनरी सेशन) में भारतीय ज्ञान परंपरा और भारत की वैश्विक भूमिका पर विचार-विमर्श हुआ। सत्र का संचालन डॉ. दीपेंद्र मोहन सिंह ने किया। सह-अध्यक्ष डॉ. महेंद्र सिंह ने कहा कि भूगोल केवल स्थान का अध्ययन नहीं, बल्कि संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
मुख्य वक्ता पद्म श्री डॉ. रामचेत चौधरी ने “बास्केट केस इंडिया से दुनिया के लिए फूड बास्केट” विषय पर कहा कि मानव और पौधों के बीच खाद्य संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं और आज भारत वैश्विक खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
प्रो. जे.एन. सिन्हा ने प्राचीन काल में मध्य गंगा बेसिन की भौगोलिक परिस्थितियों और उसके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। डॉ. रुचिका सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा के तीन प्रमुख स्तंभ— व्यवस्थित ज्ञान, मौखिक परंपरा और कौशल आधारित परंपरा की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवंत परंपराएं ही वास्तविक ज्ञान का आधार हैं।
सत्र की अध्यक्षता डॉ. बी.एन. सिंह ने की तथा सह-अध्यक्ष प्रो. सी.पी. सिंह ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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