———1———
मौन वृक्ष में शांति के फ़ुल आते हैं,
जिसके फल संतुष्टि देकर जाते हैं।
संतुष्टि देकर जाते हैं मानव जीवन में,
मौन करता है का जीवन का उद्धार।
मौन का वृत्त यदि टूट जाता है कभी,
मचने लगता है चहुँओर हाहाकार।
आदित्य कहते हैं ध्यान रखिए यह,
मौन से बड़ा नहीं है कोई आचार।
———2———
यह युद्ध एक दिन ख़त्म हो जाएगा,
शांति की होगी तब जय जय कार।
ऐ युद्ध तेरा नामो निशाँ मिट जाएगा,
जब इंसानियत की होगी दरकार।
तेरा सारा वजूद ही मिट जाता है,
सदियों से रहा है गवाह इतिहास।
आदित्य धरती के नक्से तू बदलता है,
पर सारा संसार करता है तेरा उपहास।
———3———
दुःख सुख रुख़ तेरा देता है प्रभु,
दीनन के दीनबंधु कहलाते हो।
किरपा बरसाते जाते हो हे प्रभु,
सबके आँगन के दिये जलाते हो।
तन मन निर्मल सबका करते प्रभु,
ज्ञान कपाट खुलवाकर जाते हो।
आदित्य मद लोभ रोग मिटा करके,
भक्तन के भक्त ख़ुद ही बन जाते हो।
———4———
आदि अनादि अनंत अखंड,
अछेद्य अभेद्य सुवैद्य प्रभू हैं।
निराकार हैं साकार भी हैं,
वही साक्षात ओंकार भी हैं।
महेश सुरेश गणेश औ शेष,
सदाशिव शंभु, सत्य शिव हैं।
आदित्य दीनबन्धु दीनानाथ हैं,
अनाथन के नाथ भोले नाथ हैं।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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