जीवन के तीन प्रहर बीते, बस एक प्रहर ही बाकी है,
तीन आश्रम बीत चुके, अब सन्यासी जीवन बाक़ी है।
बृह्मचर्य, गृहस्थ रहकर ही वानप्रस्थ भी भोग चुके,
यूँ तो पुरुषार्थ किये होंगे, पर मोक्ष तो मिलना बाक़ी है।
धर्म, अर्थ, काम में फँसकर, कैसे जीवन निकल गया,
माया-मोह की चका-चौंध में जीवन हाथों से फिसल गया।
भौतिकता की ख़ातिर सब कुछ पाने की अभिलाषा,
पाया भी सब कुछ जीवन में, पर लिप्सायें तो बाकी हैं।
दुनिया को हम क्या दे पाये, दुनिया से हमने क्या पाया,
गुणा- भाग सब करके देखा यह लेखा – जोखा बाक़ी है।
मोक्ष प्राप्ति की ख्वाहिश में, बस मुट्ठी ख़ाली खुली रही,
दुनिया से नाता कैसा है, ये गणना भी बाकी है।
यादें बीते पल की आयें इस भाग-दौड़ के चक्कर में,
वर्तमान का होश नहीं, संतोष कहाँ कोई मन में।
हानि-लाभ व यश-अपयश, ईश्वर के हाथ में होते हैं,
जीवन की गति- नियति यही है, पर संतोष तो पाना बाक़ी है।
यूं ही शायद जीवन बीते, अंतिम क्षण यूं ही आएगा,
अंतर्मन में है छिपा यही, इस प्रश्न का उत्तर बाक़ी है।
मेरा तेरा करते करते, अपनी ख़ुशियाँ अपने सपने,
मेरे बच्चे, मेरे अपने, आदित्य ये जीवन साक्षी है।
दर्द दूसरों का देख सके, आंखों में आँसू आए कभी ?
अंधकार मिट जाये जब, बस यही चुनौती बाक़ी है।
शाम ढले, तो ढले मगर, दूर कहीं उस बस्ती में,
अंधकार छाने से पहले रोशनी जलाना बाकी है।
तीन प्रहर यूँ बीत गये, बस एक प्रहर ही बाकी है,
सारा जीवन ही यूँ बीता, पर मोक्ष का मिलना बाकी है।
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