वैश्विक ऊर्जा बाजार में अमेरिका, रूस, ईरान और चीन के बीच चल रहा तेल खरीद का खेल अब भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत महंगा अमेरिकी कच्चा तेल खरीद रहा है, जबकि चीन रूस और ईरान से रियायती (डिस्काउंटेड) तेल लेकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर रहा है। इससे चीन की अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल रहा है।
अमेरिकी दबाव और तेल नीति
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ Brahma Chellaney ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दावा किया कि Donald Trump प्रशासन भारत पर रूसी तेल कम करने और अमेरिकी क्रूड बढ़ाने का दबाव बना रहा है। उनके अनुसार, ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी इसी तरह के दबाव के चलते भारत ने ईरान से सस्ता तेल लगभग बंद कर दिया था और अमेरिका बड़ा सप्लायर बनकर उभरा था।
वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal ने भी ‘इंपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन’ की बात स्वीकार की है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि शिपिंग कॉस्ट जोड़ने पर अमेरिकी तेल मिडिल ईस्ट के मुकाबले महंगा पड़ता है।
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चीन को फायदा, भारत पर बोझ?
रूस और ईरान का तेल ब्रेंट बेंचमार्क से 9–11 डॉलर प्रति बैरल तक डिस्काउंट पर मिलता है। ऐसे में चीन रिकॉर्ड मात्रा में सस्ता तेल खरीद रहा है, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा मजबूत हो रही है।
भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, 2025-26 में रूसी तेल की हिस्सेदारी घटाकर 33–35% पर ला चुका है। वहीं अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़ रही है। फरवरी 2026 में चीन ने रूस से 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ज्यादा तेल आयात किया, जबकि भारत का आयात घटकर लगभग 1.1–1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया।
क्या है भारत के लिए जोखिम?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने ऊर्जा नीति को राजनीतिक दबाव से अलग नहीं रखा, तो दीर्घकाल में इसका असर महंगाई, व्यापार घाटे और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।
हालांकि भारत ने आधिकारिक तौर पर रूसी तेल बंद करने की पुष्टि नहीं की है, लेकिन वैश्विक प्रतिबंधों और दबाव के कारण डिस्काउंट घट रहे हैं। ऐसे में भारत को वेनेजुएला जैसे वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं।
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