भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का विस्तार जरूरी, बीबीएयू में दो दिवसीय कार्यशाला का समापन

भारतीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन का सशक्त माध्यम बनाने पर जोर

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में भारतीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन का प्रभावी माध्यम बनाने पर जोर दिया गया। बीबीएयू एवं भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना के राज्य स्तरीय क्रियान्वयन हेतु’ आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का मंगलवार को समापन हुआ। कार्यशाला में भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों के लेखन, प्रकाशन और प्रसार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विचार-विमर्श हुआ।कार्यक्रम बीबीएयू के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के निर्देशन एवं संरक्षण में आयोजित किया गया। समापन सत्र में काशी विद्यापीठ, बनारस के प्रो. नरेंद्र नारायण, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय, भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय बनारस के प्रो. शैलेश मिश्रा, जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा और कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे। प्रो. उदयन मिश्र ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया।प्रो. नरेंद्र नारायण ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पंक्तियों ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भाषा किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान-विकास और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार और अध्ययन-अध्यापन के प्रयासों का उल्लेख करते हुए हिंदी को शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की सशक्त भाषा के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा में शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन, कला और जीवन मूल्यों से जुड़ा व्यापक ज्ञान मौजूद है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और आधुनिक संदर्भों में विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों का निर्माण और व्यापक प्रसार विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।प्रो. सुषमा पाण्डेय ने कहा कि भाषा ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा, वैदिक शिक्षा, योग और भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान-विमर्श में उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तक भाषा और शिक्षा से जुड़े प्रावधानों और प्रयासों की भी चर्चा की।

प्रो. शैलेश मिश्रा ने भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में डिजिटल तकनीक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने ई-पुस्तकों, डिजिटल पुस्तकालयों, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री और ऑडियो-वीडियो माध्यमों के जरिए भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की जरूरत बताई।डॉ. अजय मिश्रा ने शोध को समाज की वास्तविक समस्याओं और जनसरोकारों से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सार्थक शोध वही है, जिसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। हिंदी को संचार की भाषा तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान, अनुसंधान और अकादमिक विमर्श की प्रभावी भाषा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।कार्यशाला में ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना : एक परिचय’ विषय पर विशेष सत्र भी हुआ। इसमें भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों के लेखन, प्रकाशन और प्रसार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने राज्य स्तर पर योजना के क्रियान्वयन से संबंधित प्रक्रियाओं और संभावनाओं पर विचार साझा किए। समूह गतिविधियों के माध्यम से योजना के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कर उपयोगी सुझाव भी दिए गए।कार्यक्रम में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से आए शिक्षक, प्रतिभागी तथा बीबीएयू के शिक्षक और गैर-शिक्षण अधिकारी मौजूद रहे।

Editor CP pandey

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