स्थानांतरण के बाद भी ‘रसूख’ सक्रिय: जमीन के बदले आदेश, फोन पर जारी सिफारिशें

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि स्थानांतरण के बाद भी कुछ अधिकारी ‘रसूख’ के धंधे से हाथ नहीं खींच पा रहे हैं। सदर तहसील में तैनात रहे एक सक्षम अधिकारी का ताज़ा मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है, जिसने स्थानांतरण के बावजूद एक विवादित भूमि मामले में रसूखदार पक्ष के लिए फोन पर सिफारिश जारी रखी है।

सूत्रों के अनुसार, सदर तहसील के एक न्यायालय में भूमि विवाद का मामला अंतिम फैसले की ओर बढ़ रहा है। इसमें एक पक्ष के पास ठोस सबूत हैं, जबकि दूसरा पक्ष फर्जी दस्तावेज़ों के दम पर लड़ाई लड़ रहा है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेज़ वाले पक्ष ने पूर्व में तैनात अधिकारी को मोटी रकम एडवांस में देकर अपना पक्ष मजबूत कर लिया था। लेकिन अधिकारी का स्थानांतरण हो जाने के बाद भी, वह अब दूरभाष के माध्यम से संबंधित अधिकारी पर दबाव डाल रहा है कि निर्णय उसी पक्ष में जाए जिसने ‘रसूख की फीस’ चुकाई है।

मुख्यमंत्री के शहर में खुला खेल
चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब मुख्यमंत्री के गृहजनपद में हो रहा है, जहां से सरकार लगातार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और पारदर्शी न्याय की बात करती है। लेकिन राजस्व विभाग के कुछ कथित अधिकारी और कर्मचारी इन नीतियों को धत्ता बताते हुए ‘रसूख की अर्थव्यवस्था’ चला रहे हैं। नतीजा यह है कि ईमानदार और तथ्य आधारित पक्ष न्याय की लड़ाई में हार की कगार पर पहुंच जाते हैं, जबकि गलत पक्ष रिश्वत और सिफारिश के सहारे जीत दर्ज करा लेता है।

जमीन के बदले आदेश का सौदा
सूत्र बताते हैं कि मामले में आदेश देने के एवज में जमीन की रजिस्ट्री तक कराने की तैयारी थी। यानि न्याय की कुर्सी अब ‘बिकाऊ संपत्ति’ में तब्दील हो चुकी है, जहां जनता की उम्मीदें और न्याय की गरिमा, दोनों ही ‘मोलभाव’ का शिकार हो रही हैं।

सरकार की छवि को चोट
प्रदेश सरकार आम जनता को बेहतर सुविधा देने और समयबद्ध न्याय दिलाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करती रही है। इसके बावजूद राजस्व विभाग में ऐसे अधिकारी-कर्मचारी ‘जनहित’ की जगह ‘निजी हित’ को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह न केवल मुख्यमंत्री की मंशा के खिलाफ है, बल्कि सरकार की साख को भी धूमिल कर रहा है।

जनता में गुस्सा, विभाग में सन्नाटा
इस तरह के खेल की चर्चा अब आम जनमानस में जोर पकड़ रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं—जब स्थानांतरण के बाद भी अधिकारी फोन पर फैसले तय करा सकते हैं, तो फिर भ्रष्टाचार खत्म होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? विभाग के भीतर इस मामले पर आधिकारिक स्तर पर चुप्पी है, लेकिन बाहर जनता में आक्रोश उबाल पर है।

Editor CP pandey

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