ऑफिस में आओ मिलो आकर,
काम सही हो जाएगा मिलकर,
बस एक इशारा वो देते हैं फिर,
जेब गर्म उनकी कर दो जाकर।
भ्रष्टाचार की नींव मज़बूत यहाँ,
जेब गर्म करने की होती बात जहाँ,
हर छोटे बड़े काम की निश्चित दर,
ऊपर से धौंस जमाते, नहीं कोई डर।
हर दफ़्तर में, हर टेबल पर,
दराज़ें आगे पीछे की जाती हैं,
गेट के अंदर और गेट के बाहर
महफ़िलें दलालों की मिलती हैं।
नये नये बने ओवर ब्रिज भी,
असमय में ही गिर जाते हैं,
सड़कों की हालत तो ऐसी है,
कच्चे गलियारे अच्छे होते हैं।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा है भारत
पूँजी पतियों की यहाँ पर चाँदी है,
एक साल में पूँजी दूनी हो जाती है,
सरकारी ख़ज़ाना बिलकुल ख़ाली है।
आदित्य नहीं कोई सुनने वाला,
और नहीं कहीं कोई देखने वाला,
हाथी जैसी चाल चल रहा तन्त्र,
सत्ता की मस्ती में है जो मतवाला।
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