अहंकार मनुष्य का प्रबल शत्रु

सिकन्दरपुर /बलिया(राष्ट्र की परम्परा) आचार्य शान्तनु जी कर्नाटक से चलकर राजसूय यज्ञस्थल पर पधारे योगाचार्य स्वामी जयदेव ब्रह्मचारी ने नित्य की भाँति प्रशिक्षुओं को योगाभ्यास कराया। अपनी टीम के साथ भक्तिभूमि श्रीधाम वृन्दावन से चलकर सरयू तटवर्ती ग्राम इहा बिहरा (जिला बलिया) की धरती पर आयोजित राजसूय महायज्ञ में पधारों साध्वी सरोज बाला ने कृष्ण-जन्मोत्सव की बधाइ‌याँ गाकर सबको आनन्दित कर दिया। उन्होंने कन्स के भेजे अनेक राक्षसों के वध और पूतना-उध्दार के प्रसंगों पर गम्भीर वक्तव्य दिया। वैदिक यज्ञमण्डप के अन्तर्गत पं० रेवती रमण तिवारी के आचार्यत्व में यज्ञपुरुष एवं आवाहित अन्यान्य देवी-देवताओं का पूजन अर्चन वन्दन हवन एवं आरती-स्तुति की गयी। लक्ष्यप्राप्ति श्रध्दा विश्वास जरूरी रामकथा-मर्मज्ञ आचार्य श्री शान्तनु जी महाराज ने रामकथा के महत्त्व पर

प्रकाश डालते हुए कहा कि कथा में भगवान का साक्षात् दर्शन सम्भव है क्योंकि – “मेरा रिश्ता पुराना है, साँवरे से मिलने का।” सात काण्डों में लिखी रामायण को कहीं से उठाकर देखें तो वहीं से आनन्द मिलने लगता है। वस्तुतः यह कथा शंकरजी ने खुद लिखी “शंकर ने खुद लिखी है, श्रीराम की कहानी।” मानस के अनुसार – “रचि महेश निज मानस राखा । पाइ सुसमय शिवा सन भाखा।” इन्हीं कारणों से मानस के आरम्भ में भव-भवानी की वन्दना की गयी है। शंकर जी विश्वास रूप और भवानी श्रद्धा रूपा हैं। श्रध्दा-विश्वास के बिना बड़े-बड़े योगी- यती लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते। कहानी जब याद ही है तो कथा सुनते ही क्यों? कोई न कोई रहस्य अवश्य है। सती सँग शंकरजी अगस्त्य ऋषि के पास जाकर उनसे कथा सुनते हैं सुनी महेश परम सुख मानी।” चाहे होते तो शंकर जी कैलास पर कथावाचक बुला लिए होते किन्तु कथा सुनने स्वयं जाना पड़ता है। सो वे कुम्भज ऋषि के पास गये कुम्भात जायते इति कुम्भः।” कुछ लोग चलकर कथा सुनते हैं, कुछ घिसटते हैं। हवा न रहने पर साइकिल का यही हाल होता है। रामकथा अगाध और अपार है “रामायण शत कोटि अपारा।” कथा सुनने के प्रभाव से शंकर को श्रीराम का दर्शन मिला, शम्भु ने दूर से ही राम को प्रणाम किया किन्तु सती के मन में संशय उत्पन्न हुआ। शंकर जी बोले ” जो तुम्हरे मन अति सन्देहू, तो तुम जाइ परीक्षा लैह।” प्रभु की परीक्षा लेने वाले की दुर्गति होती है। सती परीक्षा लेने गयी, शंकर प्रतीक्षा में बैठे, विचार किये होइहें सोइ जो राम रचि राखा।” राम ने देखा तो हाथ जोड़ लिया और कहा- देवि ! आप वन में अकेली घूम रही है? महादेव जी कहाँ है। सती निरुत्तर हो गयी, उसने सर्वत्र राम ही राम देखा “जहँ ।चितवाहें तहँ प्रभु आसीना ।” भयमुक्त होना चाहो तो प्रभु की शरण में जाओ। सांसारिक गति- – विधियों पर किसी का अधिकार नहीं, उसे तो परमात्मा ही जानते हैं।संकल्प ले लिया- “शिव संकल्प कीन्ह मन माहीं, एहि तन सती भेंट अब नाहीं।

किराद्ध-प्रतिष्ठा में मदान्ध दक्ष ने उसी समय यज्ञ ठाना। उसने सबको किया आमन्त्रित किन्तु अपने ही दामाद शंकर को जान बूझकर निमन्त्रण नहीं भेजा। “नहिं कोइ अस जनमा जग नाहीं, प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।” आकाश मार्ग से यज्ञ में जा रहे देवताओं को देख सती ने पति से पूछा- ये लोग कहाँ जा रहे हैं। शंकर ने सारी बात बतायी। सती बोली- आपकब चलेंगे? शम्भु ने कहा- भला अनाहूत मैं वहाँ क्यों जाऊँ? सुती बोली- माता पिता गुरु के यहाँ बिना बुलाये भी जाना चाहिए, सो में, जाऊंगी। शंकर ने गों के साथ सती को वहाँ भेज दिया। वहाँ जाते ही सती से उसकी माँ तो बड़े प्रेम से मिली भेंटी किन्तु माँ को छोड्डू कर सबने सती पर व्यंग्य-वाण बरसाये। माँ की ममता की कहीं कोई समता नहीं है-

केहू केतनो दुलारी बाकी माई ना होई। जग में माई बिना केहुवे सहाईना होई ॥

जब सती ने मखशाला में अपने पति का कहीं कोई स्थान नदेखा तो पूति का अपमान उसे असह्य हो गया “सबसे कठिन जाति अपमाना।” सती योगाग्नि प्रकट कर उसी में अपनी शरीर को स्वाहा कर दिया। समाचार सुनकर शंकर ने बीरभद्र को भेजा, उसने दक्ष का सिर काटकर हवनकुण्ड में डाल दिया। जब सती का प्राणान्त होने लगा तो उसकी एक ही इच्छा अवशेष थी कि शंकरजी भावी जन्म में भी उसे पति रूप में प्राप्त हों। इसी इच्छा के अनुरूप सती अगले जन्म में पार्वती बनी। देवर्षि नारदने पार्वती को तपस्या करने की सलाह दी। पार्वती तप में प्रवृत्त हुई। उधर महादेव भी समाधिस्थये।

वक्ता ने कहा कि प्रभु की तपस्या में शक्ति-सञ्चय होता है। ताड़‌कासुर के आतंक से मुक्ति केलिए शंकर की समाधि का टूटना और उनका विवाह आवश्यक था। उधर कामदेव के दुराग्रह से कुपित शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया। विचित्र बारातियों के सँग शंकर जी विवाहार्थ चले और शंकर-पार्वती का विवाह सुसम्पन्न हुआ

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