सादुल्लानगर क्षेत्र में बारिश न होने से खेतों में पड़ी दरारें, धान की खेती संकट में

सादुल्लानगर/बलरामपुर(राष्ट्र की परम्परा)। श्रवणमास के मध्य तक पहुँचने के बावजूद सादुल्लानगर क्षेत्र में अब तक ढंग की बारिश नहीं हुई है। मानसून की बेरुखी का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ रहा है। खेतों में धान की नर्सरी तो लग चुकी है, लेकिन पानी के अभाव में पौधों का विकास रुक गया है। खेतों की मिट्टी अब सूखकर दरकने लगी है और जगह-जगह गहरी दरारें दिखाई देने लगी है। किसान उदयभान,श्यामलाल,राधेश्याम श्रीवास्तव,सुशील और विनोद,संजय,विनय जैसे दर्जनों किसानों का कहना है कि हर साल जुलाई के पहले सप्ताह तक अच्छी बारिश हो जाती थी, जिससे खेतों में जलभराव होता था और धान की रोपाई की जाती थी। लेकिन इस साल जुलाई का तीसरा सप्ताह भी बीत गया है और खेत अभी तक प्यासे है। नहरों में पानी नहीं है और
निजी ट्यूबवेल से सिंचाई करना हर किसान के लिए संभव नहीं है। डीजल को बढ़ती कीमतों और बिजली की अनियमितता किसानों की मुश्किलें बढ़ा ने भी दी हैं। प्राकृतिक आपदा के इस दृश्य को देखकर किसानों के चेहरों पर चिंता
की लकीरें साफ देखी जा सकती है। कई खेतों की स्थिति इतनी खराब है कि वहाँ न तो सिंचाई की जा सकती है और न ही पौधों की जड़ें जमीन पकड़ पा रही हैं। खेतों में खड़ी धान की पंक्तियाँ सूखने लगी हैं और खेत की जमीन जगह-जगह से फट रही
है। जलवायु परिवर्तन का यह असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर चोट कर रहा है। यदि अगले एक सप्ताह के भीतर बारिश नहीं हुई तो पूरा धान चक्र ही खतरे में पड़ जाएगा। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे हालात में वैकल्पिक फसलें या सूखा-रोधी बीज अपनाने की सलाह देनी चाहिए। परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी जानकारी और संसाधनों की भारी कमी है। किसानों ने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि सूरखा प्रभावित गांवों की सूची तैयार कर तुरंत राहत कार्य शुरू किया जाए। यदि यह स्थिति बनी रही तो अगली फसल के लिए खाद-बीज की भी व्यवस्था नहीं हो पाएगी और किसानों की आर्थिक हालत और बिगड़ जाएगी। तस्वीरें गवाही दे रही हैं कि धरती किस हद तक प्यास से दरक चुकी है। किसान अब भी आसमान की ओर उम्मीद से देख रहे हैं, शायद बादल दया करें और सावन को फिर से हरियाली से भर दें।।