Friday, February 20, 2026
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डॉ. अरुणेश नीरन नहीं रहे: हिंदी-भोजपुरी साहित्य जगत ने खोया एक अनमोल रत्न

देवरिया,(राष्ट्र की परम्परा)हिंदी और भोजपुरी साहित्य के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार डॉ. अरुणेश नीरन के निधन से साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। देवरिया जिले से संबंध रखने वाले डॉ. नीरन ने जीवन भर भाषा, साहित्य, संस्कृति और मंचों के माध्यम से देश-विदेश में देवरिया की पहचान को मजबूती दी।

उनकी असामयिक मृत्यु की सूचना जैसे ही आई, साहित्य प्रेमियों, विद्यार्थियों, रंगकर्मियों और उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर छा गई। सोशल मीडिया से लेकर साहित्यिक संस्थानों तक, हर मंच पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।

कई पीढ़ियों के मार्गदर्शक थे
डॉ. नीरन न केवल एक कुशल लेखक और कवि थे, बल्कि वे एक संवेदनशील शिक्षक, वक्ता और सांस्कृतिक प्रेरणा स्रोत भी रहे। उन्होंने हिंदी और भोजपुरी के मंचों पर देवरिया की आवाज़ को बुलंदी के साथ पहुँचाया। उनके काव्य में जहां लोक की सुगंध थी, वहीं वैश्विक दृष्टिकोण भी साफ झलकता था।

साहित्यिक योगदान अविस्मरणीय
उन्होंने कई कविता-संग्रह, निबंध और भोजपुरी लोक-साहित्य पर आधारित रचनाएं प्रस्तुत कीं, जो शोधार्थियों और पाठकों के लिए मार्गदर्शक बनीं। डॉ. नीरन की लेखनी में संवेदना, सामाजिक चेतना और भाषिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय था।

खालीपन को भर पाना कठिन
उनके जाने से देवरिया की साहित्यिक पहचान को गहरा आघात पहुंचा है। जिन मंचों पर डॉ. नीरन की ओजस्वी वाणी गूंजती थी, वहां आज एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई है। यह रिक्तता सिर्फ साहित्यिक जगत की नहीं, बल्कि हर उस मन की है जो भाषा और संस्कृति से प्रेम करता है।

सांत्वना व श्रद्धांजलि
साहित्यकारों, शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सभी ने एक स्वर में कहा कि डॉ. नीरन का स्थान सदियों तक कोई नहीं भर सकेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिजनों को इस दुःख को सहने की शक्ति दे।

“हिंदी-भोजपुरी का _एक_ उज्ज्वल दीपक बुझ गया, लेकिन उसकी रौशनी पीढ़ियों तक हमें राह दिखाती रहेगी।”

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