लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)
ग्रामीण भारत से लेकर कस्बों और छोटे शहरों तक, विकास योजनाओं के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। नल-जल योजना, प्रधानमंत्री सड़क योजना, ग्रामीण आवास, श्मशान-घाट, तालाब खुदाई और नाली-निर्माण जैसी योजनाएँ न सिर्फ सरकारी फाइलों में बल्कि भाषणों और रिपोर्टों में भी चमचमाती दिखती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यहां लोकल विकास में भ्रष्टाचार एक ऐसी बीमारी बन चुका है, जो व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रहा है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि नल-जल योजना के तहत बिछाई गई पाइपलाइन कई जगह अधूरी पड़ी है, कहीं पाइप डालकर छोड़ दिए गए तो कहीं पानी पहुंच ही नहीं रहा। बरसों पहले स्वीकृत सड़कों की हालत ऐसी है कि बरसात के मौसम में गाड़ियां फंस जाती हैं और पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। गांवों के घाटों की मरम्मत के लिए पास हुए बजट सिर्फ कागजों में खर्च हो चुके हैं, जबकि वास्तविक स्थिति में वहां झाड़ियां और गंदगी फैली हुई है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्थानीय अधिकारी और संबंधित विभाग अक्सर शिकायतों को नजरअंदाज कर देते हैं। ग्राम सभाओं में सवाल उठाने पर ग्रामीणों को आश्वासन और तारीखें मिलती हैं, लेकिन धरातल पर काम शुरू नहीं होता। कई मामलों में तो बिना काम कराए ही बिल पास कर दिए जाते हैं, जिससे साफ पता चलता है कि लोकल विकास में भ्रष्टाचार कितनी गहराई तक फैल चुका है।
योजनाओं की निगरानी के लिए बनाए गए सिस्टम भी निष्क्रिय दिखाई देते हैं। सामाजिक अंकेक्षण और निरीक्षण जैसे प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। परिणाम यह है कि जनता का विश्वास धीरे-धीरे सरकारी योजनाओं से उठता जा रहा है। जिन योजनाओं का मकसद नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना था, वही आज अविश्वास और नाराजगी की वजह बन रही हैं।
अगर सच में विकास चाहिए, तो अब पारदर्शिता, जवाबदेही और जन-निगरानी को मजबूत करना ही होगा। जब तक लोकल विकास में भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक कागज़ों का विकास सिर्फ भ्रम बना रहेगा और जमीन पर धूल उड़ती रहेगी।
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