सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की ऐतिहासिकता को स्वर्णित अक्षरों में अंकित किया : भिक्खु चन्दिमा थेरो

संस्कृति संवाद से समृद्ध होती है : प्रोफेसर राजवंत राव

  • भारतीय संस्कृति अभिरूचि पाठ्यक्रम की सप्त दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला सम्पन्न

गोरखपुर/नवनीत मिश्र (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर में संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के तत्वाधान में मंगलवार को भारतीय संस्कृति अभिरूचि पाठ्यक्रम के सप्त दिवसीय राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का सप्तम दिवस का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर किया। व्याख्यान श्रृंखला के प्रथम सत्र में ‘‘ बौद्ध धम्म के विकास में सम्राट अशोक की भूमिका एवं योगदान ” पर विषय विशेषज्ञ भिक्खु चन्दिमा थेरो, संस्थापक अध्यक्ष, बुद्धा धम्मा लर्निंग सेन्टर, सारनाथ, वाराणसी एवं दूसरे सत्र में ‘‘ भारतीय संस्कृति ” पर विषय विशेषज्ञ प्रोफेसर डाॅ. राजवन्त राव, संकाय अध्यक्ष, कला संकाय, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर द्वारा व्याख्यान दिया गया। कार्यक्रम का संचालन रीता श्रीवास्तव, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी कलाकार द्वारा की गयी।
व्याख्यान कार्यक्रम के समापन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. मंगलेश श्रीवास्तव, महापौर नगर निगम, गोरखपुर द्वारा पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र का वितरण भी किया गया।
मुख्य अतिथि डाॅ. मंगलेश श्रीवास्तव, महापौर ने कहा कि डाॅ. यशवन्त सिंह राठौर जिस भी कार्य की जिम्मेवारी लेते है। उसे बखूबी निभाते हैं। संग्रहालय द्वारा निरन्तर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता सहित कला, इतिहास एवं पुरातात्विक संग्रहों के संरक्षण के सतत प्रयासरत है। जिसका सारा श्रेय डाॅ. यशवन्त सिंह राठौर, उप निदेशक बौद्ध संग्रहालय एवं उनकी सहयोगी टीम को जाता है।
पहले सत्र में ‘‘ बौद्ध धम्म के विकास में सम्राट अशोक की भूमिका एवं योगदान ” विषय पर बोलते हुए मुख्य विषय विशेषज्ञ- भिक्खु चन्दिमा थेरो, संस्थापक अध्यक्ष, बुद्धा धम्मा लर्निंग सेन्टर, सारनाथ, वाराणसी ने कहा कि सम्राट अशोक एक महाराजा होते हुए भी उन्होंने अपने पुत्र एवं पुत्री को बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजने के साथ-साथ एशिया के विभिन्न देशों में बुद्ध के धम्म का प्रसार किया। उन्होंने जन कल्याण के साथ-साथ पशु-पक्षियों आदि के लिए कुएं, सड़कों के किनारे पेड़ तथा चिकित्सा आदि की सुविधा प्रदान की। अशोक जैसे शासक जो सोते, जागते हर वक्त जनता के दुख को दूर करने के लिए आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने भगवान बुद्ध के हजारों उपदेशों के तहत कई हजार बौद्ध स्तूप, शिलालेख एवं स्तम्भ पूरे देश में निर्मित कराकर बौद्ध धम्म की ऐतिहासिकता को स्वर्णित अक्षरों में अंकित कर दिया।
दूसरे सत्र में ‘‘ भारतीय संस्कृति ” विषय पर विषय विशेषज्ञ प्रोफेसर डाॅ. राजवन्त राव ने कहा कि कोई भी संस्कृति संवाद से समृद्ध होती है। जब संवाद टूटता है तो संस्कृति छिन्न भिन्न हो जाती है। भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता की संस्कृति को दर्शाती है। जोकि समन्वयवादी है। भारतीय संस्कृति एक सौम्य एवं अनाक्रामक संस्कृति है, जिसमें भगवान बुद्ध की विचारधारा एवं संदेशों का समन्वय है।
राजकीय बौद्ध संग्रहालय द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला में कुल 178 प्रतिभागी पंजीकृत थे, जिनमें से चयनित 89 प्रतिभागियों को पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र से सम्मानित किया गया। प्रथम पुरस्कार रीता श्रीवास्तव को, द्वितीय पुरस्कार दीक्षा गुप्ता को, तृतीय पुरस्कार बसन्त लाल को तथा सान्त्वना पुरस्कार ऋद्धि शर्मा व अनिमेष कुमार चतुर्वेदी को प्राप्त हुआ। विशेष सहयोग के लिए उदयशील, वैभव सिंह एवं रजनीकान्त मौर्य को प्रदान किया गया।
इसके पूर्व व्याख्यान के मुख्य वक्ताओं को संग्रहालय की ओर से उप निदेशक डाॅ. यशवन्त सिंह राठौर ने स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। साथ ही कार्यक्रम की सफलता के लिए सभी प्रतिभागियों, अभिभावकों, मीडिया बन्धुओं को धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से डॉ. जसवीर सिंह चावला, डॉ. सुजाता गौतम, डाॅ. प्रमोद कुमार त्रिपाठी, आशीष श्रीवास्तव, शिवनाथ, एडवोकेट सुषमा श्रीवास्तव, वैभव सिंह, रजनीकांत मौर्य उदयशील सहित शताधिक लोग उपस्थित रहे।

rkpNavneet Mishra

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