लक्ष्मणरेखा के पार: उपराष्ट्रपति धनखड़ का इस्तीफा और सत्ता-संविधान के बीच संघर्ष


✍️ दिव्या भोसले, पत्रकार, मुंबई

भारतीय राजनीति में कुछ फैसले क्षणभर में होते हैं, लेकिन उनके प्रभाव लम्बे समय तक प्रतिध्वनित होते रहते हैं। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा दिया गया अचानक इस्तीफा भी ऐसा ही एक निर्णय है, जो केवल एक संवैधानिक पद से त्यागपत्र नहीं है, बल्कि सत्ता के गलियारों में उठी एक ऐसी अनुगूंज है, जिसने राजनीतिक समीकरणों को झकझोर कर रख दिया है।

धनखड़ को सत्ताधारी दल का ‘विश्वासपात्र’ माना जाता रहा है। वे अक्सर सरकार के रुख के साथ खड़े दिखाई देते थे—चाहे वह राज्यसभा की कार्यवाही हो या न्यायपालिका पर परोक्ष टिप्पणी। लेकिन हालिया महीनों में उनका रुख धीरे-धीरे बदला। संवैधानिक पद की गरिमा निभाते हुए वे जब सत्ता से थोड़ी दूरी बनाते दिखे, तब सत्ता पक्ष की असहजता सामने आने लगी।

इस असहजता का सबसे स्पष्ट संकेत था उनका अरविंद केजरीवाल से मुलाकात करना, जो भले ही औपचारिक रहा हो, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से वह एक ‘संदिग्ध’ क्षण था। इस मुलाकात के बाद धनखड़ के कुछ बयान और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के विरुद्ध महाभियोग नोटिस स्वीकार करना, सत्तापक्ष के लिए एक स्पष्ट ‘सिग्नल’ था कि अब उपराष्ट्रपति स्वतंत्र सोच की ओर बढ़ चुके हैं।

संवाद की राजनीति और सत्ता की बेचैनी

धनखड़ ने हाल के समय में विपक्षी नेताओं के साथ संवाद बढ़ाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश और प्रमोद तिवारी जैसे नेताओं से बातचीत ने इस ‘यू-टर्न’ को और स्पष्ट कर दिया। विपक्ष, जो कभी उनके खिलाफ महाभियोग की मांग कर रहा था, अब सहानुभूति में बयान देने लगा। वहीं, भाजपा और संघ के भीतर उनके इस बदलाव को ‘पथभ्रष्टता’ की तरह देखा जाने लगा।

बीमारी या बहाना?

उनके इस्तीफे का कारण बीमारी बताया गया है। एम्स में उनकी एंजियोप्लास्टी हुई थी और बेहोशी की घटनाएं भी सामने आईं। यह एक स्वीकार्य कारण प्रतीत होता है। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि राजनीतिक फैसलों के पीछे केवल स्वास्थ्य कारण ढाल की तरह प्रयुक्त होते हैं, वास्तविक कारण अक्सर सत्ता-संविधान के बीच के संघर्ष में छिपे होते हैं।

नई राजनीतिक चालें

धनखड़ के इस्तीफे के बाद नए समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम उपराष्ट्रपति या राज्यसभा अध्यक्ष के रूप में सामने आना एक संकेत है कि भाजपा आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए नई रणनीति पर काम कर रही है। धनखड़ का इस्तीफा यहां भी एक मोहरा बन गया है, जिससे चुनावी गणित को साधा जा सके।

एनजेएसी और न्यायपालिका से टकराव

धनखड़ ने एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) की पुनर्स्थापना की वकालत करते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कठोर टिप्पणियाँ की थीं। उनकी टिप्पणियाँ कभी-कभी सरकार की ‘अधिकारिक नीति’ जैसी प्रतीत होती थीं, जिससे सरकार पर दबाव बनने लगा था। शायद यही वह ‘लक्ष्मणरेखा’ थी, जिसे पार करने के बाद सत्ता ने ‘राजनीतिक सजा’ के रूप में त्यागपत्र को चुना। संवैधानिक मर्यादा बनाम सत्ता की अपेक्षा

यह घटना एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि जब कोई संवैधानिक पदाधिकारी अपनी वैचारिक स्वतंत्रता बनाए रखता है और सत्ता के दायरे से बाहर कदम रखता है, तो उसे ‘लक्ष्मणरेखा’ पार करने की सजा भुगतनी पड़ती है। उपराष्ट्रपति धनखड़ का इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का निजी निर्णय नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ताधारी अपेक्षाओं के बीच चल रही अंतहीन खींचतान की परिणति है।

Editor CP pandey

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