भारत और विश्व इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ पुराने ढाँचे तेजी से बदल रही वास्तविकताओं से टकरा रहे हैं। यह केवल नए वर्ष का आरंभ नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं की पुनर्समीक्षा का समय है।
देश के भीतर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियाँ लगातार जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं। प्रयागराज का माघ मेला आस्था का आयोजन होने के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक निरंतरता का उदाहरण है। करोड़ों लोगों की सहभागिता यह दर्शाती है कि आधुनिकता के दबाव के बावजूद भारतीय समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है।
आर्थिक मोर्चे पर संकेत मिश्रित हैं। उपभोक्ता बाजार की सक्रियता और औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी उम्मीद जगाती है, लेकिन महँगाई, बेरोजगारी और असमान विकास जैसी चुनौतियाँ भी उतनी ही वास्तविक हैं। आवश्यक है कि विकास के लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
वैश्विक परिदृश्य कहीं अधिक अस्थिर दिखाई देता है। जलवायु संकट, तकनीकी बदलाव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को और स्पष्ट कर दिया है। इसके बावजूद, भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक शांति के प्रयासों को कमजोर कर रहे हैं।
भारत के लिए यह समय अवसर और सावधानी—दोनों का है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़ी पहलों में हुए सुधार सकारात्मक संकेत देते हैं, लेकिन इनकी निरंतरता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना नीति-निर्माताओं की बड़ी जिम्मेदारी है।
खेल और संस्कृति के क्षेत्र में बढ़ती उपलब्धियाँ देश की सॉफ्ट पावर को मजबूती दे रही हैं। युवा प्रतिभाओं का उभार यह संकेत देता है कि आने वाला समय नई ऊर्जा और नई सोच का होगा।
संक्रमण काल की यह तस्वीर स्पष्ट संदेश देती है। चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन संभावनाएँ भी कम नहीं। 2026 की शुरुआत यह अपेक्षा करती है कि नीतियाँ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहें, बल्कि सामाजिक न्याय, समावेशन और दीर्घकालिक स्थिरता को केंद्र में रखें। यही रास्ता भारत और विश्व दोनों के लिए आगे बढ़ने का सही विकल्प होगा।
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