चतुर्भुजनाथ पोखरे का नहीं हो सका विकास, 3.27 करोड़ खर्च के बाद भी हाल बेहाल

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। सिकन्दरपुर कस्बे में स्थित ऐतिहासिक चतुर्भुजनाथ पोखरे का विकास वर्षों से अधर में लटका हुआ है। शासन द्वारा जलाशयों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के तहत इस पोखरे के लिए दो चरणों में कुल 3 करोड़ 27 लाख 32 हजार रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास कार्य न के बराबर नजर आ रहा है। वर्ष 2017 में स्वदेश योजना के तहत 1.28 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस धनराशि से मंदिर परिसर का विकास तो कराया गया, लेकिन पोखरे के सौंदर्यीकरण और वास्तविक सुधार की दिशा में बेहद सीमित कार्य हुआ। पोखरे के पश्चिमी किनारे पर कुछ सीढ़ियों का निर्माण ही मात्र देखने को मिला। इसके बाद वर्ष 2024 में बंधन योजना के अंतर्गत पुनः 1.99 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए। इस बार उम्मीद थी कि पोखरे का समुचित विकास हो पाएगा, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही। स्थानीय लोगों के अनुसार, आज भी पोखरे में नगर पंचायत का नाभदान गिराया जा रहा है, जिससे जल की गुणवत्ता दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। साथ ही, आसपास के शौचालयों का गंदा पानी भी सीधे पोखरे में छोड़ा जा रहा है। गंभीर बात यह भी है कि पोखरे के चारों ओर अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में जब बंधन योजना के अंतर्गत चल रहे कार्यों की जांच के लिए नोडल अधिकारी त्रिभुवन प्रसाद पहुंचे, तो उन्होंने मौके पर अनाधिकृत अतिक्रमण और गंदे पानी की निकासी पर नाराजगी जताई। उन्होंने अधिशासी अभियंता मनोज कुमार पांडेय और चेयरमैन प्रतिनिधि संजय जायसवाल को निर्देश दिया कि नाभदान के पानी की निकासी के लिए वैकल्पिक नाले का प्रस्ताव तत्काल भेजा जाए। सूत्रों की मानें तो न तो अभी तक कोई प्रस्ताव भेजा गया है और न ही अतिक्रमण रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया गया है। इससे स्थानीय नागरिकों में भारी रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि शासन द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही के चलते ऐतिहासिक धरोहरों का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। पोखरे के पश्चिमी तट पर स्थित ठाकुर जी का मन्दिर पोखरे के उत्तर-पूर्वी कोने पर स्थित ऐतिहासिक जामा मस्जिद और उत्तर दिशा में कुछ दूरी पर स्थित हाशिम शाह चहार जर्ब (दाता साहब) की मजार इस क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश करती हैं। यह स्थल धार्मिक विविधता के बीच आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक मेलजोल का जीवंत प्रतीक है। हर सुबह और शाम जब मंदिर के घंटे और मस्जिद की अजान की आवाज एक साथ वातावरण में गूंजती हैं, तो यह दृश्य लोगों के दिलों में एकता और सौहार्द का भाव भर देता है। यह स्थान मानो एक खुला संदेश दे रहा हो”मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।” स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में ‘गया’ नामक एक राजा कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर इस क्षेत्र में आए थे। यहां के एक गड्ढे से प्राप्त जल से स्नान के बाद उनका रोग पूरी तरह समाप्त हो गया। यह घटना न केवल चमत्कारी मानी गई, बल्कि इसी स्थान पर खुदाई के दौरान भगवान विष्णु और शिव की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं। इन्हीं मूर्तियों की स्थापना के साथ चतुर्भुजनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। यह स्थान तब से श्रद्धा, आस्था और चमत्कारों का केंद्र बन गया।

Karan Pandey

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