“जनगणना 2027: विकास, राजनीति और समाज का नया ब्लूप्रिंट”

भारत की जनगणना 2027: सुप्रीम कोर्ट की मुहर के साथ डेटा क्रांति की ओर बढ़ता देश, सामाजिक न्याय और नीतिगत बदलाव का नया अध्याय

भारत में प्रस्तावित जनगणना 2027 केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना को नए सिरे से परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक कदम साबित होने जा रही है। लगभग 146 करोड़ से अधिक आबादी वाले इस विशाल देश में अंतिम जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी, जबकि नियमानुसार यह प्रक्रिया 2021 में पूरी होनी थी। लेकिन वैश्विक महामारी कोविड-19 और प्रशासनिक चुनौतियों के चलते यह टलती रही। अब 2027 में होने वाली जनगणना को भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
इस बीच 10 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने जातिगत जनगणना को रोकने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर पाया और नीतिगत मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप उचित नहीं है। इससे सरकार को इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का स्पष्ट रास्ता मिल गया है।
2027 की जनगणना की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूर्णतः डिजिटल होना है। पहली बार मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, जियो-टैगिंग और रियल टाइम डेटा संग्रहण जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इससे डेटा अधिक सटीक, तेज और पारदर्शी होगा। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से सरकार को योजनाएं बनाने में बड़ी सहायता मिलेगी।

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इस जनगणना का एक और महत्वपूर्ण पहलू जातिगत डेटा संग्रह है। वर्ष 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों का व्यापक डेटा एकत्र किया जाएगा। अब तक केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े ही लिए जाते रहे हैं। यह पहल सामाजिक न्याय, संसाधनों के समान वितरण और नीतिगत सुधारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, इसके साथ यह बहस भी जुड़ी है कि इससे सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है, जबकि समर्थक इसे सटीक नीति निर्माण का आधार मानते हैं।
जनगणना 2027 को दो चरणों में आयोजित किया जाएगा। पहला चरण 2026 में हाउस लिस्टिंग और आवास गणना का होगा, जबकि दूसरा चरण फरवरी 2027 में जनसंख्या गणना का होगा। इसमें नागरिकों की आयु, शिक्षा, रोजगार, जीवन स्तर और जाति से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी।
इस बार जनगणना में 33 प्रश्न शामिल किए गए हैं, जो केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवनशैली, तकनीकी पहुंच और आर्थिक स्थिति का भी आकलन करेंगे। पानी, बिजली, शौचालय, इंटरनेट, मोबाइल, वाहन और उपभोग से जुड़े प्रश्न सरकार को जमीनी हकीकत समझने में मदद करेंगे।

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आर्थिक दृष्टि से यह जनगणना अगले एक दशक की विकास योजनाओं का आधार बनेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और डिजिटल ढांचे से जुड़ी नीतियां इन्हीं आंकड़ों के आधार पर तय होंगी। वहीं सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर यह प्रतिनिधित्व, आरक्षण और अधिकारों की बहस को भी प्रभावित कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की यह डिजिटल जनगणना एक उदाहरण बन सकती है। यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है, तो अन्य विकासशील देशों के लिए यह एक मॉडल के रूप में उभरेगी कि कैसे तकनीक के माध्यम से बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण और नीति निर्माण किया जा सकता है।
स्पष्ट है कि जनगणना 2027 केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक व्यापक दस्तावेज होगी। यदि इसे पारदर्शिता और संतुलन के साथ लागू किया गया, तो यह देश को अधिक समावेशी और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


संकलनकर्ता: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र)

Editor CP pandey

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