
यूपी सरकार से चिकित्सा व्यवस्था सुधारने की कार्ययोजना तलब
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए एक नवजात की मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने राज्य सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए तत्काल और दीर्घकालिक उपायों की स्पष्ट, समयबद्ध एवं ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की खंडपीठ ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को शपथपत्र के माध्यम से कार्ययोजना दाखिल करने को कहा है। साथ ही प्रदेश के बजट में चिकित्सा सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित धनराशि का अनुपात भी बताने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने टिप्पणी की कि वित्तीय संसाधनों की कमी को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बनने दिया जाना चाहिए।
यह आदेश अशुतोष कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। मामला उस नवजात की मौत से संबंधित है, जिसे सुलतानपुर से बेहतर उपचार के लिए लखनऊ लाया गया था और केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान तथा एसजीपीजीआई में उपचार की कोशिश की गई थी।
पीठ ने कहा कि मामला केवल एक नवजात को उपचार मिलने या नहीं मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दे सामने आते हैं। अदालत ने नए मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त बुनियादी ढांचा, विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाएं और वेंटिलेटर सहित जरूरी जीवनरक्षक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
अदालत के अनुसार, यदि गंभीर मरीज को उच्च चिकित्सा केंद्र भेजना आवश्यक हो तो उसे ले जाने वाली एंबुलेंस में भी जरूरी चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नवजात को सामान्य एंबुलेंस से लखनऊ लाया गया था।
वहीं, केजीएमयू के चिकित्सकों और बच्चे के परिजनों की ओर से अस्पताल में बच्चे को दिखाए जाने तथा बेड की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। पीठ ने कहा कि ऐसे विरोधाभासी दावों से सरकारी अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के लिए बेहतर मार्गदर्शन, सूचना और परामर्श व्यवस्था की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
15 दिन में जांच रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की जांच कराकर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर उसने किसी चिकित्सक या अस्पताल की लापरवाही को लेकर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है।
अदालत ने कहा कि जांच में यदि किसी स्तर पर कमी या लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी निर्धारित करने के साथ पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के मुद्दे पर भी विचार किया जाएगा।
मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी। पीठ ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव के अलावा केजीएमयू, एसजीपीजीआई और आरएमएलआईएमएस से संबंधित चिकित्सकों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अगली सुनवाई में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।
