Thursday, May 14, 2026
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सत्य और अहिंसा के देवदूत थे महात्मा गांधी – डॉ धर्मेन्द्र पाण्डेय

महात्मा गांधी के शहीदी दिवस पर कांग्रेसियों ने किया नमन

सलेमपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। आजादी के महानायक महात्मा गांधी के शहीदी दिवस पर नगर के गांधी चौक स्थित उनके प्रतिमा पर माल्यार्पण कर ब्लॉक कार्यालय पर गोष्ठी का आयोजन कर उनको नमन किया गया। इस दौरान सम्बोधित करते हुए जिला उपाध्यक्ष डॉ धर्मेन्द्र पांडेय ने कहा कि महात्मा गांधी वास्तव में सत्य और अहिंसा के देवदूत थे।उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।आज उनके नीतियों और सिद्धांतों पर चल कर ही देश विकसित हुआ है।

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ब्लॉक अध्यक्ष मनीष कुमार रजक ने कहा कि अहिंसा के पुजारी गांधी जी के विचारों को आज कुछ नफरत फैलाने वाले लोग खत्म करना चाहते हैं लेकिन देश की जनता इन नफरती ताकतों के मंसूबे को सफल नहीं होने देगी। युवा कांग्रेस के सोशल मीडिया के प्रदेश संयोजक सत्यम पांडेय ने कहा कि आज युवाओं को महात्मा गांधी के जीवन से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

गोष्ठी को नगर अध्यक्ष प्रमोद श्रीवास्तव,डॉ याहिया अंजुम, चुन्नू श्रीवास्तव,विनोद कुमार, रामकेवल चौहान,नवलकिशोर पांडेय, विजय कुशवाहा,अखिलेश मिश्र, विनय विश्वकर्मा आदि ने सम्बोधित किया।

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सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ माकपा का जनसंपर्क अभियान शुरू

सलेमपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। देश में बढ़ती साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ, देश की सांझी विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने तथा आपसी भाईचारा मजबूत करने के उद्देश्य से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सलेमपुर ने एक व्यापक जनसंपर्क अभियान की शुरुआत की है। यह अभियान 30 जनवरी महात्मा गांधी के शहादत दिवस से प्रारंभ होकर 23 मार्च भगत सिंह के शहादत दिवस तक चलेगा।
अभियान की शुरुआत शुक्रवार को माकपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गांधी चौक सलेमपुर से की। इस अवसर पर गांधी चौक पर धरना देते हुए एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय लोग शामिल हुए। सभा को संबोधित करते हुए माकपा नेता सतीश कुमार ने कहा कि आज समाज में नफरत और विभाजन की राजनीति तेजी से बढ़ रही है। ऐसे माहौल में महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और सद्भाव के विचारों को आम जनता तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि यह अभियान गांधी और भगत सिंह दोनों की शहादत से जुड़ा है, जो देश की एकता, अखंडता और सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। माकपा इस दौरान गांव-गांव जाकर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करेगी और भाईचारा, सद्भाव और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का संदेश देगी।

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माकपा नेताओं ने बताया कि 23 मार्च तक सलेमपुर क्षेत्र के विभिन्न गांवों में बैठकें, गोष्ठियां और जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि आम लोगों को जोड़ा जा सके और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा दिया जा सके।
इस मौके पर प्रेम चंद यादव, रामनिवास यादव, बलविंदर मौर्य, संजय गौण सहित कई अन्य माकपा नेता और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में गांधी के विचारों को आत्मसात करने और समाज में नफरत के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करने का संकल्प लिया गया।

अगर चाहें तो मैं इसे और ज्यादा धारदार हेडलाइन, टीवी स्क्रिप्ट, या सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में भी तैयार कर सकता हूँ।

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अमेरिकी हमले की आशंका, ईरान ने इस्फहान परमाणु साइट सील की

तेहरान (राष्ट्र की परम्परा)। अमेरिका के संभावित हमले की आशंका के बीच ईरान के परमाणु ठिकानों पर गतिविधियां तेज हो गई हैं। बीते 24 घंटों में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में ईरान के इस्फहान शहर स्थित परमाणु केंद्र पर नई हलचल देखी गई है। यह वही परमाणु संयंत्र है, जिस पर पिछले साल अमेरिका और इजरायल के हमले में भारी नुकसान हुआ था।

अंडरग्राउंड एंट्री गेट दोबारा किए गए सील

इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी के अनुसार, ईरान ने एक बार फिर इस्फहान स्थित अंडरग्राउंड परमाणु परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार को मिट्टी से भरकर बंद कर दिया है। इसके साथ ही दक्षिणी प्रवेश द्वार पर भी ताजा मिट्टी डाली जा रही है, जिससे पूरे रास्ते को पूरी तरह सील किया जा सके।

अमेरिकी हमले से बचाव की रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका के संभावित सैन्य हमले से बचाव के लिए उठाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका उद्देश्य करीब 408 किलो संवर्धित यूरेनियम वाले भंडारण केंद्रों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करना है।

पहले खोले गए थे गेट, सुरंगें की गईं मजबूत

इससे पहले इंजीनियरिंग कार्यों के लिए इन प्रवेश द्वारों को अस्थायी रूप से खोला गया था। उस दौरान सुरंगों को अत्यधिक मजबूत कंक्रीट से तैयार किया गया था, ताकि किसी संभावित हमले का असर कम किया जा सके।

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यूरेनियम स्टोरेज को बनाया जा रहा किले जैसा

ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए पूरे इलाके को लगभग किले में तब्दील कर रहा है। सुरक्षा को कई स्तरों पर मजबूत किया जा रहा है, जिससे बाहरी हमले का प्रभाव न्यूनतम रहे।

जमीन के ऊपर की इमारत में भी हलचल

सैटेलाइट तस्वीरों में यह भी सामने आया है कि जमीन के ऊपर मौजूद उस इमारत में भी गतिविधियां जारी हैं, जहां पहले सेंट्रीफ्यूज मशीनें बनाई जाती थीं। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गई है।

क्या होता है सेंट्रीफ्यूज

सेंट्रीफ्यूज एक विशेष मशीन होती है, जिसका उपयोग यूरेनियम को संवर्धित (Enrich) करने के लिए किया जाता है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में किया जा सकता है।

पिछले साल अमेरिका-इजरायल का हमला

पिछले साल जून में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाकर हमले किए थे। इन हमलों में नतांज, फोर्दो और इस्फहान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचा था। दोनों देशों का आरोप है कि ईरान नागरिक परमाणु कार्यक्रम की आड़ में परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।

ईरान का दावा और बातचीत का गतिरोध

ईरान लगातार दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक उपयोग के लिए है। वहीं अमेरिका अपनी शर्तों पर परमाणु समझौता चाहता है। अब डोनाल्ड ट्रंप फिर बिना शर्त बातचीत की बात कर रहे हैं, लेकिन ईरान ने साफ कहा है कि हमले की धमकियों के बीच कोई बातचीत संभव नहीं है।

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तेज रफ्तार जीप की टक्कर से बाइक सवार की मौत, चालक वाहन छोड़कर फरार

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। सिकंदरपुर थाना क्षेत्र में शुक्रवार अपराह्न तेज रफ्तार का कहर देखने को मिला। जय जयप्रभा कन्या इंटर कॉलेज तिलौली के पास बेकाबू जीप ने बाइक सवार युवक को जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में गंभीर रूप से घायल युवक की इलाज के लिए ले जाते समय मौत हो गई, जबकि जीप चालक वाहन छोड़कर मौके से फरार हो गया। घटना के बाद क्षेत्र में सनसनी फैल गई।
जानकारी के अनुसार उभांव थाना क्षेत्र के अखोप गांव निवासी 40 वर्षीय रामू गुप्ता शुक्रवार को किसी कार्य से सिकंदरपुर आए थे। काम निपटाने के बाद वह बाइक से मालदह की ओर लौट रहे थे। इसी दौरान तिलौली गांव के पास सामने से आ रही तेज रफ्तार जीप ने उनकी बाइक में जबरदस्त टक्कर मार दी।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक जीप गलत दिशा में आ रही थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि रामू गुप्ता सड़क पर जा गिरे और उनके सिर में गंभीर चोट आई। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों की मदद से एंबुलेंस बुलाकर घायल को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर भेजा गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

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सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। हादसे के बाद से ही जीप चालक फरार है, जिसकी तलाश में पुलिस जुटी हुई है।

परिजनों के अनुसार मृतक रामू गुप्ता बिहरा में अपनी बहन के यहां रहकर मालदह चट्टी पर अंडे की दुकान चलाते थे। घटना की खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया है।

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माता-पिता के संस्कार और गांव के संकल्प से रचा इतिहास: दरौली के सूरज जायसवाल बने एमबीबीएस

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद महराजगंज की ग्राम सभा दरौली के लिए यह क्षण गर्व, हर्ष और प्रेरणा से भरा है। गांव के होनहार युवक सूरज जायसवाल ने महज 27 वर्ष की उम्र में एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर न सिर्फ अपने माता-पिता और परिवार का नाम रोशन किया, बल्कि पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया है। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच अडिग संकल्प, सतत परिश्रम और सामूहिक सहयोग से मिली यह सफलता आज दरौली की पहचान बन गई है।
सूरज जायसवाल, पुत्र राधारमण जायसवाल, ग्राम पंचायत दरौली के मूल निवासी हैं। उन्होंने सेमी मेडिकल यूनिवर्सिटी, कज़ाकिस्तान से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और तत्पश्चात भारत में स्क्रीनिंग परीक्षा उत्तीर्ण कर यह सिद्ध किया कि प्रतिभा अवसर की मोहताज नहीं होती—उसे दिशा, अनुशासन और विश्वास चाहिए।
अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय देते हुए सूरज ने भावुक स्वर में कहा कि उनकी इस यात्रा में माता मीरा जायसवाल, पिता राधारमण जायसवाल, चाचा घनश्याम जायसवाल, चाची रीता जायसवाल, बहन खुशबू जायसवाल सहित पूरे परिवार और ग्रामवासियों का नैतिक, भावनात्मक और आर्थिक सहयोग निर्णायक रहा।
उन्होंने कहा, यदि परिवार का भरोसा और गांव का आशीर्वाद न होता, तो यह मुकाम संभव नहीं था। हर कठिन मोड़ पर मेरे घर के लोगों ने तन-मन-धन से मेरा साथ दिया और मेरा मनोबल बढ़ाया।
एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने के बाद सूरज जायसवाल ने समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य केवल डॉक्टर बनना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों तक गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं पहुंचाना है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को दूर करने की दिशा में काम करने की इच्छा जताई।
सूरज की सफलता से दरौली सहित आस-पास के गांवों में उत्साह का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि सूरज आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्तंभ हैं। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि दृढ़ निश्चय, अनुशासन और सामूहिक सहयोग से किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। गांव के युवाओं में शिक्षा के प्रति नई ऊर्जा और विश्वास जागृत हुआ है।
दरौली का यह बेटा आज पूरे महराजगंज की शान बन गया है—एक ऐसा उदाहरण, जो बताता है कि संस्कार, संघर्ष और सहयोग मिलकर इतिहास रचते हैं।

बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना को लेकर डीएम ने बुलाई अहम बैठक

पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ने पर दिया गया जोर

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
गोरखपुर में पर्यटन को नई गति देने और बाहर से आने वाले पर्यटकों को बेहतर आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिलाधिकारी दीपक मीणा ने अपने कार्यालय कक्ष में बेड एंड ब्रेकफास्ट (बेड ऐंड ब्रेकफास्ट) योजना को लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ विस्तृत बैठक की। बैठक में योजना के सुचारु क्रियान्वयन, पंजीकरण प्रक्रिया, मानकों तथा विभागीय समन्वय पर गंभीरता से चर्चा की गई।
जिलाधिकारी ने कहा कि गोरखपुर धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण जनपद है। ऐसे में बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना पर्यटकों के लिए किफायती, सुरक्षित और घरेलू वातावरण वाला आवास उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह योजना स्थानीय नागरिकों के लिए अतिरिक्त आय और स्वरोजगार का सशक्त माध्यम भी बनेगी।
बैठक में पर्यटन विभाग, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, पुलिस प्रशासन, अग्निशमन विभाग, विद्युत विभाग और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। डीएम ने निर्देश दिए कि योजना के तहत पंजीकरण और स्वीकृति की प्रक्रिया सरल और समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि इच्छुक लोग बिना किसी परेशानी के इससे जुड़ सकें। उन्होंने कहा कि अनावश्यक अड़चनें योजना की सफलता में बाधक बनती हैं, जिन्हें हर हाल में दूर किया जाए।
डीएम दीपक मीणा ने पर्यटकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि बेड एंड ब्रेकफास्ट इकाइयों में आवश्यक सत्यापन, अग्निशमन सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाएं। पुलिस विभाग को सत्यापन प्रक्रिया को प्रभावी और पारदर्शी बनाने के निर्देश दिए गए।
बैठक में यह भी बताया गया कि गोरखनाथ मंदिर, रामगढ़ताल, रेलवे स्टेशन और प्रमुख धार्मिक स्थलों के आसपास पर्यटकों की आवाजाही अधिक रहती है। डीएम ने ऐसे क्षेत्रों में संभावित आवास इकाइयों की पहचान कर स्थानीय निवासियों को योजना से जोड़ने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जनजागरूकता के माध्यम से योजना का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए।
जिलाधिकारी ने कहा कि बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना केवल ठहरने की व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, आतिथ्य और परंपराओं को प्रदर्शित करने का अवसर भी प्रदान करती है। स्थानीय व्यंजन, स्वच्छ वातावरण और सौहार्दपूर्ण व्यवहार पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाएंगे और गोरखपुर की सकारात्मक छवि स्थापित करेंगे।
बैठक के अंत में डीएम ने सभी संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करते हुए योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना गोरखपुर के पर्यटन विकास और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

पुलिस लाइन क्वार्टर गार्ड पर दो मिनट मौन रखकर मनाया गया गांधी जी का शहादत दिवस

डीआईजी/एसएसपी के निर्देशन में अधिकारियों व जवानों ने अनुशासन के साथ दी श्रद्धांजलि

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की शहादत दिवस (सदाहत दिवस) पुलिस लाइन स्थित क्वार्टर गार्ड पर सादगी, अनुशासन और गंभीरता के साथ मनाई गई। यह आयोजन डीआईजी/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में किया गया, जिसमें उपस्थित अधिकारियों, पुलिसकर्मियों एवं जवानों ने दो मिनट का मौन रखकर महात्मा गांधी के बलिदान को स्मरण किया।
कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार का औपचारिक अनुष्ठान नहीं किया गया। सभी अधिकारी एवं जवान कतारबद्ध होकर शांत मुद्रा में खड़े रहे और दो मिनट के मौन के माध्यम से राष्ट्रपिता के सत्य, अहिंसा और शांति के संदेश को आत्मसात किया। पूरे क्वार्टर गार्ड परिसर में इस दौरान पूर्ण शांति और अनुशासन का वातावरण बना रहा।
इस अवसर पर एसपी सिटी अभिनव त्यागी, सीओ कैंट योगेन्द्र सिंह, सीओ कोतवाली ओंकार दत्त तिवारी, प्रतिसार निरीक्षक हरी शंकर सिंह सहित पुलिस लाइन के अधिकारी, जवान तथा आरटीसी की महिला जवानें उपस्थित रहीं। सभी ने गरिमापूर्ण ढंग से कार्यक्रम में सहभागिता निभाई।
अधिकारियों ने कहा कि महात्मा गांधी का जीवन देश और समाज के लिए एक स्थायी प्रेरणा है। उनके सिद्धांत आज भी प्रशासन और पुलिस व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक हैं। पुलिस बल का दायित्व केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना ही नहीं, बल्कि जनता के प्रति संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवहार करना भी है, जो गांधीवादी विचारधारा का मूल तत्व है।
कार्यक्रम के दौरान यह संदेश दिया गया कि महात्मा गांधी के आदर्शों को केवल स्मरण तक सीमित न रखते हुए उन्हें अपने आचरण और कार्यप्रणाली में उतारना आवश्यक है। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही समाज में शांति और विश्वास कायम किया जा सकता है।
शहादत दिवस के अवसर पर पुलिस लाइन क्वार्टर गार्ड पर आयोजित यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण, अनुशासित और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। अंत में सभी अधिकारियों एवं जवानों ने संकल्प लिया कि वे राष्ट्रपिता के विचारों से प्रेरणा लेते हुए जनसेवा और राष्ट्रसेवा के अपने दायित्वों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करेंगे।

अनिल साहनी की 8 दिसम्बर को हुए जमीनी विवाद के मारपीट में इलाज के दौरान हुई मौत

फलमंडी के दरोगा पंकज पर आरोपियों के साथ मिलिगत कर हल्का धारा में मुकदमा दर्ज करने का परिजनों ने लगाया आरोप

परिजनों ने हत्या का मुक़दमा लिखे जाने की उच्च अधिकारियों से की मांग

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
रामगढ़ताल थानाक्षेत्र के महेवा फलमंडी निवासी अनिल साहनी की 8 दिसम्बर को हुए जमीनी विवाद के मारपीट में इलाज के दौरान गुरुवार को मौत हो गयी। आपको बता दे कि अनिल साहनी का महेवा में 28 डिसमिल जमीन है। जो कि उनके दादी चनजोता के नाम से है। आरोप है कि दादी के भतीजे ने बहला फुसलाकर जमीन को लिखवा लिया है। जिसके बाद अनिल साहनी कोर्ट चले गये। मामला न्यायालय में विचाराधीन है। 8 दिसम्बर को चनजोता के भतीजे अमित,रवि,धर्मेन्द्र व अतुल जमीन पर कब्जा करने आ गये। जिसकी सूचना अनिल साहनी को मिली। वह अपने पत्नी शारदा व माता कमली देवी के साथ मौके पर पहुँच गया। लेकिन दादी के चारो भतीजे अमित,रवि,धर्मेन्द्र व अतुल ने मिलकर अनिल साहनी को लाठी डंडों से बहुत मारा पीटा और साथ ही पत्नी शारदा को भी मारा पीटा। अनिल को अधमरा छोड़कर दबंग भाग गये। जब इसकी सूचना पुलिस को दी गयी तो फलमंडी चौकी के चौकी प्रभारी पंकज ने अनिल को ले जाकर मेडिकल करवाया। लेकिन पत्नी का मेडिकल नही करवाया। पत्नी को भी चोटे आई थी
परिजनों को दरोगा पंकज पर मिलीभगत का अंदेशा हुआ। रामगढ़ताल थाने में हल्के धारा में एनसीआर दर्ज कर दिया। जिसके बाद इलाज के लिए भेज दिया । अनिल जिलाअस्पताल में भर्ती था। लेकिन मामले को सीरियस देखकर अनिल को लखनऊ पीजीआई भेज दिया गया। परिजन 10 दिसंबर को पहुँचकर एसएसपी से दरोगा पंकज की शिकायत की। और धारा बढ़ाने की मांग की। एसएसपी ने आश्वासन दिया। 29 जनवरी गुरुवार को अनिल साहनी की मृत्यु हो गया। जिसके बॉडी को घर लाया गया। शुक्रवार को पत्नी शारदा ने दरोगा परिजन पर दबंगों के साथ मिलकर जमीन कब्जा करवाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि दरोगा पंकज शुरू से मामले को शिरियस नही ले रहे थे। जिसके कारण आज मेरी पति की मृत्यु हो गयी है। मेरी दो बेटी और एक लडका है। मेरा और उनका जीवन यापन कैसे होगा। इसलिए मेरी मांग है कि दरोगा पंकज पर कार्यवाही की जाये। और चारो लड़को के ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज करवाकर उनकी गिरफ्तारी की जाये। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हुआ। अब देखना है कि वरिष्ठ अधिकारी क्या कार्यवाही करते है।

लखनऊ के 56 चौराहा कैप्टन अंशुमान चौक”के नाम से जाना जायेगा

बरहज(राष्ट्र की परम्परा)
तहसील क्षेत्र के ग्राम अकूबा निवासी वीर सपूत शहीद कैप्टन अंशुमान सिंह के नाम से जाना जाएगा लखनऊ का 56चौराहा। इस उपलब्धि को सुन जनपद मे ख़ुशी की लहर वही अकूबा निवासी अपने लाल के नाम से बने चौराहे को लेकर गौरवान्वित है।
बताते चले की अकूबा निवासी शहीद कैप्टन अंशुमान सिंह के पिता रविप्रताप सिंह ने बेटे की याद को देशवासियो के दिलो मे जगाये रखने के लिए गोरखपुर से अकूबा तक शहीद एकसप्रेस बस सेवा शुरू किया गया, इस उपलब्धि से क्षेत्रवासी फुले नहीं समा रहे है।इससे पूर्व लखनऊ मे ही अंशुमान सिंह चौराहे का उद्धघाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के द्वारा किया गया था। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए रविप्रताप सिंह ने बेटे शहीद अंशुमान सिंह की स्मृति मे छावनी परिषद लखनऊ के सौजन्य से बनाये गए कैप्टन अंशुमान चौक पर उनके प्रतिमा का उद्घाटन, लेफ्टिनेंट जनरल शीवीद्र सिंह एवं कैप्टन अंशुमान सिंह के परीजनो के साथ किया गया।
इस अवसर पर जी ओ सी मध्य भारत हम एरिया, स्टेशन कमांडर, कमांडेंट ओ की सी, कमांडेंट मध्य कमान चिकित्सालय, सी ई ओ छावनी परिषद, एवं विभिन्न पदों पर आसीन पांच मेजर जनरल, छः ब्रिगेडियर,दह कर्नल, तमाम सैन्यकर्मियों सहित उपस्थित रहे , जिन्होंने कैप्टन अंशुमान सिंह की प्रतिमा को पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किये।
ज्ञात हो कि कैप्टन अंशुमान सिंह बतौर चिकित्साधिकारी के रूप में तैनाती के दौरान 19 जुलाई 2023 को सियाचिन के मध्य ग्लेशियर के चंदन कांप्लेक्स पर हुए भीषण अग्निकांड में फंसे अपने पांच साथियों को सुरक्षित आग से बाहर निकाल लिया था, जब चौथी बार अपने बंकर में जीवन रक्षक दवाओं एवं मेडिकल उपकरणों को बचाने के लिए घुसे, किन्तु नियती को कुछ और ही मंजूर था और वे अपना सर्वोच्च बलिदान देते हुए शहीद हो गए। उनके इस अदम्य साहस, कर्तव्य परायणता, उच्च इच्छाशक्ति, देशसेवा के लिए भारत सरकार ने मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया था। कैप्टन अंशुमान सिंह आजाद भारत में गोरखपुर मंडल के इकलौते कीर्ति चक्र विजेता है। लखनऊ की धरती पर स्थापित यह दूसरी प्रतिमा है। इससे पूर्व 21 अगस्त 2024 को कैप्टन अंशुमान सिंह चौराहे का उद्घाटन स्वयं योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा किया गया था। सरकार द्वारा प्रदत्त यह सम्मान शहीदों के प्रति समर्पित आस्था एवं सच्ची श्रद्धा का प्रतीक है।इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह ने नाम करण के सरकार का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं सेना के बैंड ने राष्ट्रगान बजाकर सैन्य सम्मान अर्पित किया। देवरिया के बरडीहा का यह लाल देश पर अपनी जान न्यौछावर कर ग्राम , जनपद, मंडल एवं देश का नाम रोशन कर गया।इस अवसर पर तमाम ग्राम वासियों ने लखनऊ उद्घाटन समारोह में उपस्थित होकर अपने अंश अंशुमान की वीरगाथा को नमन करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ को ‘विद्या सागर’ की मानद उपाधि

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। राजधानी लखनऊ निवासी साहित्यकार, कवि, लेखक, समाजसेवी एवं सेना से सेवानिवृत्त विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ को काशी हिन्दी विद्यापीठ, वाराणसी द्वारा ‘विद्या सागर’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। यह सम्मान अकादमिक परिषद की अनुशंसा पर गत दिवस आयोजित समारोह में प्रदान किया गया। स्वास्थ्य कारणों से वे समारोह में उपस्थित नहीं हो सके।
यह उपाधि उन्हें शिक्षा, शोध, साहित्य सृजन और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय योगदान के लिए प्रदान की गई। डॉ कर्नल मिश्र को अब तक डॉक्टरेट की तीन मानद उपाधियाँ सहित साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में 620 से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद वे निरंतर समाज सेवा से जुड़े रहे हैं। उनके नौ काव्य संग्रह और दो लेख संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि पचास से अधिक साझा काव्य संग्रहों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। उनकी कविताएँ और लेख विभिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।
उनके पाँच अन्य काव्य और लेख संग्रह शीघ्र प्रकाशनाधीन हैं।

उत्तर प्रदेश में फरवरी से राशन वितरण में बड़ा बदलाव….

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खाद्य एवं रसद विभाग के आदेशानुसार लोगों की खाद्य आदतों को ध्यान में रखते हुए लागू की जा रही नई व्यवस्था..

मऊ ( राष्ट्र की परम्परा )उत्तर प्रदेश में फरवरी से राशन वितरण कार्यक्रम में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने फरवरी 2026 से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन वितरण के अनुपात में संशोधन किया है। यह बदलाव खाद्य एवं रसद विभाग के आदेशानुसार लोगों की खाद्य आदतों को ध्यान में रखते हुए लागू हो रहा है, जिसमें गेहूं प्रधान और धान प्रधान मंडलों के आधार पर गेहूं-चावल की मात्रा बदली गई है। कुल राशन की मात्रा वही रहेगी।

नए वितरण नियम…..धान प्रधान मंडल जैसे आजमगढ़, गोरखपुर, वाराणसी, मिर्जापुर…….

पात्र गृहस्थी कार्डधारकों को प्रति यूनिट 1 किलो गेहूं और 4 किलो चावल मिलेगा। अंत्योदय कार्डधारकों को 10 किलो गेहूं और 25 किलो चावल।

गेहूं प्रधान मंडल ….जैसे आगरा, अलीगढ़, मेरठ, बरेली…..

प्रति यूनिट 3 किलो गेहूं और 2 किलो चावल मिलेगा। पहले यह उल्टा था। यह व्यवस्था 14 जनवरी 2026 के अपर आयुक्त आदेश से प्रभावी हो रही है। जिला पूर्ति अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए गए हैं।

विश्वविद्यालय में नवाचार और बौद्धिक संपदा गतिविधियों से शोध गुणवत्ता को मिला नया आयाम

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मिलेट्स से डायबिटीज़ मैनेजमेंट तक: गोरखपुर विश्वविद्यालय के शोध नवाचारों की नई पहल

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य संवर्धन, पोषण सुधार, पर्यावरण संरक्षण और नवाचार आधारित अनुसंधान को निरंतर सशक्त किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की शोध गतिविधियाँ समाज की समसामयिक चुनौतियों के समाधान की दिशा में नए आयाम स्थापित कर रही हैं।
मिलेट्स से डायबिटीज़ मैनेजमेंट तक
विश्वविद्यालय की शोध टीमों द्वारा विकसित समाजोपयोगी उत्पाद मधुमेह प्रबंधन, कुपोषण की रोकथाम और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।
प्रो. दिव्या रानी सिंह एवं शिवांगी मिश्रा द्वारा मिलेट्स और मोटे अनाज आधारित विशेष खाद्य उत्पाद विकसित किए गए हैं। ये उत्पाद पोषण-युक्त, फाइबर-समृद्ध तथा कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले हैं, जो डायबिटीज़ रोगियों में रक्त शर्करा नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं।
डॉ. अनुपमा कौशिक एवं समीरा हसन ने मोरिंगा पत्ती पाउडर से पोषण-समृद्ध खाद्य उत्पाद तैयार किए हैं। ये उत्पाद विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर हैं, जो स्वास्थ्य संवर्धन के साथ-साथ कुपोषण की रोकथाम में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
वहीं, डॉ. नीता सिंह एवं तरनुम खातून द्वारा प्राकृतिक अपशिष्ट पदार्थों से पर्यावरण-अनुकूल, जैव-अपघटनीय और कम लागत वाले उत्पाद विकसित किए गए हैं। यह पहल सतत विकास और प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इन सभी नवाचारों को पेटेंट से प्रोडक्ट तक लाने की दिशा में प्रो. दिव्या रानी सिंह और उनकी टीम के प्रयासों की विश्वविद्यालय स्तर पर सराहना की गई है।
IPR गतिविधियों में उल्लेखनीय प्रगति
विश्वविद्यालय में नवाचार को संरक्षित करने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) गतिविधियों को भी सुदृढ़ किया गया है। सुव्यवस्थित IPR प्रणाली के माध्यम से शोध नवाचारों की पहचान, मूल्यांकन और संरक्षण सुनिश्चित किया जा रहा है।
वर्तमान में बायोटेक्नोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में 8 प्रमुख तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है, जबकि अन्य संभावित नवाचारों को पेटेंट प्रक्रिया में सम्मिलित किया गया है।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि सशक्त बौद्धिक संपदा पारितंत्र शोध की गुणवत्ता, मौलिकता और सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है। विश्वविद्यालय में पेटेंट और अन्य IPR गतिविधियों में निरंतर वृद्धि से नवाचार को बढ़ावा मिला है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में प्रदर्शन को मजबूती मिली है।
गत दो वर्षों में विश्वविद्यालय द्वारा 79 पेटेंट आवेदन दायर किए गए हैं, जिनमें से 60 प्रकाशित हो चुके हैं और 2 प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। इसके अतिरिक्त 65 कॉपीराइट आवेदन दायर किए गए हैं, जिनमें 22 पंजीकृत हो चुके हैं, साथ ही एक ट्रेडमार्क आवेदन भी किया गया है।
IPR जागरूकता कार्यक्रम
IPR गतिविधियों को और मजबूत करने के उद्देश्य से 31 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UPCST) के सहयोग से एक IPR जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यह कार्यक्रम संस्थागत स्तर पर IPR साक्षरता को सुदृढ़ करने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
कुलपति ने विश्वास जताया कि विश्वविद्यालय के ये नवाचार और अनुसंधान प्रयास आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

मृत्यु के 12 साल बाद तक उठती रही पेंशन, महिला समेत कई पर मुकदमा दर्ज

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बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

रसड़ा पुलिस ने एक चौंकाने वाले पेंशन घोटाले का खुलासा करते हुए एक महिला सहित कई लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि मृत महिला के नाम पर वर्षों तक अवैध रूप से पेंशन निकाली जाती रही। मामले में रसड़ा क्षेत्र के भेलाई निवासी धर्मेंद्र यादव ने बुधवार को पुलिस को तहरीर देकर शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि उनके पिता मालधनी यादव, जो रेलवे से सेवानिवृत्त थे, का निधन 28 अगस्त 2007 को हो गया था। इसके बाद उनकी पत्नी प्रभावती देवी को पारिवारिक पेंशन मिलने लगी।
शिकायत के अनुसार प्रभावती देवी का भी निधन 21 मार्च 2014 को हो गया था। आरोप है कि इसके बावजूद परिजनों ने साजिश के तहत पार्वती नाम की एक अन्य महिला को प्रभावती देवी बताकर बैंक से पेंशन निकलवाना जारी रखा।

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धर्मेंद्र यादव का कहना है कि प्रभावती देवी की मृत्यु का रिकॉर्ड तहसील अभिलेखों में दर्ज है, लेकिन इसके बावजूद ब्लॉक कार्यालय के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से उन्हें जीवित दिखाया जाता रहा, जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया।ब्लॉक कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध शिकायत में कुछ ब्लॉक कर्मियों की संलिप्तता की भी आशंका जताई गई है, जिन पर अभिलेखों में हेरफेर कर पेंशन जारी रखने में सहयोग करने का आरोप है।पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा पुलिस के अनुसार तहरीर के आधार पर पार्वती, मालधनी यादव के कुछ परिजनों तथा अज्ञात ब्लॉक कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी और सरकारी धन के दुरुपयोग की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। मामले की जांच शुरू कर दी गई है और अभिलेखों की पड़ताल की जा रही है।पुलिस अधिकारियों का कहना है कि दोषियों के खिलाफ साक्ष्यों के आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह का रिजर्व पुलिस लाइन बलिया में औचक निरीक्षण

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बलिया (राष्ट्र की परम्परा)

जनपद बलिया में पुलिस व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ व अनुशासित बनाने की दिशा में पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने बुधवार के देर रात्रि रिजर्व पुलिस लाइन का औचक निरीक्षण किया। उनके इस अचानक निरीक्षण से विभागीय कर्मचारियों में हलचल देखी गई, वहीं अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी बारीकी से नजर डाली गई।निरीक्षण के दौरान पुलिस अधीक्षक ने गणना कार्यालय, जी.डी. कार्यालय, क्वार्टर गार्द, कैश कार्यालय, आदेश कक्ष, आरटीसी परिसर, स्टोर रूम सहित विभिन्न शाखाओं का क्रमवार निरीक्षण किया। इस दौरान अभिलेखों, रजिस्टरों तथा कार्यालयों में रख-रखाव की स्थिति का गहन परीक्षण किया गया। उन्होंने संबंधित कर्मचारियों से कार्यप्रणाली की जानकारी ली और अभिलेखों के अद्यतन रखरखाव पर विशेष जोर दिया। सिंह ने कार्यालयों में साफ-सफाई, दस्तावेजों के सुव्यवस्थित संधारण तथा समयबद्ध कार्य निष्पादन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश भी जारी किए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पुलिस विभाग में पारदर्शिता और अनुशासन सर्वोपरि हैं तथा इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इसके बाद पुलिस अधीक्षक ने रिजर्व पुलिस लाइन परिसर में चल रहे नव-निर्माण कार्यों का भी निरीक्षण किया। निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री के उपयोग तथा कार्य की प्रगति को परखा गया। उन्होंने कार्यदायी संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप तथा तय समय सीमा के भीतर पूर्ण कराए जाएं। गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की कमी पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।निरीक्षण के दौरान उन्होंने पुलिस कर्मियों के आवासीय सुविधाओं और प्रशिक्षण व्यवस्था का भी जायजा लिया। आरटीसी परिसर में चल रही गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बेहतर प्रशिक्षण से ही पुलिस बल की कार्यकुशलता बढ़ती है, जिससे कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में सहायता मिलती है।इस अवसर पर क्षेत्राधिकारी सदर राकेश कुमार सिंह, प्रतिसार निरीक्षक राम बेलास, आरटीसी प्रभारी अमरजीत यादव सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी को अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और तत्परता से करने के निर्देश दिए गए।
पुलिस अधीक्षक का यह औचक निरीक्षण विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और अनुशासन सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि पुलिस प्रशासन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी स्तर पर ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।

मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूँ

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रूपेश कुमार सिंह

26 जनवरी 2026 को हमारा गणतंत्र अपना 76 वर्ष पूरा हुआ ।गणतंत्र या लोकतंत्र की प्रसिद्ध परिभाषा, जिसे हम बचपन से पढ़ते व सुनते आ रहे हैं, वो है — जनता का, जनता के लिए व जनता के द्वारा संचालित शासन। क्या वर्तमान समय में उक्त परिभाषा हमारे देश के गणतंत्र पर सटीक बैठती है? क्या हम या हमारे शासक वर्ग भी ईमानदारी से यह कह सकते हैं कि हमारे देश में सच्चे अर्थों में लोकतंत्र है? कतई नहीं।

आज हमारे देश में पूंजीपतियों का, पूंजीपतियों के लिए व पूंजीपतियों के द्वारा संचालित शासन है। आज हमारे देश में गणतंत्र की जगह पर पूंजीतंत्र, लूटतंत्र व गनतंत्र है।

वर्तमान में हमारे देश की सत्ता पर काबिज ब्राह्मणीय हिंदुत्व फासीवादी नरेंद्र मोदी की सरकार ने लोकतंत्र के सभी अंगों को पंगु बना दिया है। पूरे देश में एकछत्र राज का सपना पूरा करने के लिए आरएसएस व भाजपा जी-जान से जुटी है। इन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषित कर रखा है कि जो उनके साथ नहीं है, वे इस देश के दुश्मन है।

कल तक जहां देश का अर्थ विभिन्नता में एकता था, आज देश का अर्थ सत्ताधारी सरकार बन चुका है। अब सत्ताधारी सरकार के खिलाफ बोलना मतलब देश के खिलाफ बोलना है।

इन्होंने चुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना रखी है। उसके बाद भी अगर ये चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो फिर विपक्षी पार्टियों के विधायकों को तोड़ने के लिए पैसा, सेंट्रल एजेंसियों की कारवाईयां, डराने-धमकाने आदि रास्तों का सहारा लेते है और राज्यों में अंततः अपनी सरकार बना लेते हैं। कल तक विपक्ष के भ्रष्ट नेता (इनके ही द्वारा घोषित) इनकी पार्टी में शामिल होते ही ईमानदार बन जाते है और इन पर दर्ज दर्जनों मुकदमों को वापस ले लिया जाता है।

अपने मित्र उद्योगपतियों को बहुमूल्य खनिज संपदा को सौंपने के लिए ये आदिवासियों का जनसंहार करते है। सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने वालों को ‘देशद्रोही’, ‘अर्बन नक्सल’ घोषित करती है। अपने हक-हुकूक का आवाज बुलंद करने पर मुस्लिमों को आतंकवादी घोषित किया जाता है, तो सिखों को खालिस्तानी। इस सरकार ने शिक्षा का भगवाकरण कर छात्रों को झूठा इतिहास पढ़ने को बाध्य किया है, तो युवाओं को बेरोजगारी के अंतहीन दलदल में धकेल दिया है।

महिलाओं को चारदीवारी के अंदर पूरी तरह से कैद करने की पूरी कोशिश भी हमारे ‘गणतंत्र’ के संचालक कर रहे है। हमारे गणतंत्र में ‘गणतंत्र’ के नाम पर क्या चल रहा है, यह अगर हम अपनी आंखों से संप्रदायवाद, जातिवाद, अंधभक्ति आदि का पर्दा हटाकर देखें, तो स्पष्ट दिख ही रहा है कि हमारा ‘गणतंत्र’ बिल्कुल ‘गनतंत्र’ में तब्दील हो चुका है।

आप जानते है कि हमारे गणतंत्र में बड़ी संख्या में कैदखाने (जेलें) भी है, जिनमें लाखों बंदी कैद हैं। क्या आप कैदखाने में बंद इस गणतंत्र के बंदियों के बारे में जानते हैं?

मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूं और पिछले 42 महीने से कैदखाने में कैद हूं। 42 महीने पहले मैं स्वतंत्र पत्रकारिता करता था और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सिर्फ लिखता ही नहीं था, बल्कि बोलता भी था। फलतः सरकार ने 17 जुलाई 2022 को मुझ पर काला कानून यूएपीए की कई धाराएं लगाकर मुझे गिरफ्तार कर लिया और 18 जुलाई 2022 को जेल भेज दिया।

तब से मैं झारखंड के सरायकेला डिस्ट्रिक्ट जेल और बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल, होटवार (रांची) एंव बिहार के शहीद जुब्बा सहनी सेंट्रल जेल, भागलपुर में कैद रहा और फ़िलहाल आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) में कैद हूं।

जेलों का हाल और कैदियों के अधिकार

बिहार-झारखंड के 90 प्रतिशत जेलों में क्षमता से अधिक (डेढ़ गुणा व कहीं-कहीं दुगुना) बंदी हैं। किसी भी जेल में जेल मैनुअल के अनुसार नाश्ता, भोजन, तेल-साबुन आदि नहीं मिलता है। हां! अगर आप दबंग है, तो फिर आप जेल अधिकारियों को पैसे देकर जेल में हीटर पर भी स्वादिष्ट खाना बनवा सकते है या घर व होटल से भी मंगवा सकते है।

बाकी बंदियों को तो सड़ा हुआ चावल, पानी की तरह पतली दाल, सब्जी के नाम पर आलू का दो-चार टुकड़ा व कीड़ा लगा हुआ हरी सब्जी का दो-चार कच्चा टुकड़ा व पानी, जली व कच्ची रोटियां ही नसीब में होती है। दबंग व पैसे वाले बंदियों का बिस्तर 6 फिट लंबा व 3 फीट चौड़ा होता है. तो उतनी ही जगह में 3-4 आम बंदियों को रहना पड़ता है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट (महाराष्ट्र राज्य बनाम प्रभाकर पांडुरंग 1966) के अनुसार, ‘किसी भी बंदी या कैदी को संविधान द्वारा प्रदत्त अन्य मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अनुच्छेद 21, जीवन का अधिकार’ भी प्राप्त है।’

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘एक कैदी, चाहे वह विचाराधीन हो या दोषी और यहां तक कि अदालत में उसके विरुद्ध आरोपित या सिद्ध अपराध चाहे जो भी हो, देश के अन्य नागरिकों की तरह स्वतंत्रता के अलावा सभी अधिकारों का आनंद ले सकता है।’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रौशनी में अगर हम बिहार-झारखंड के जेलों में बंद बंदियों की स्थिति को देखते हैं, तो यह एक स्वप्न-सा लगता है, क्योंकि बिहार झारखंड की जेलों में बंदियों को न तो मानव सम्मान के साथ जीने का अधिकार, शीघ्र सुनवाई का अधिकार, स्वास्थ्य व चिकित्सा उपचार का अधिकार, हथकड़ी के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार, जेल में दुर्व्यवहार व यातना के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, काम के लिए उचित मजदूरी का अधिकार एवं उचित आवास का अधिकार हासिल है और न ही जेल मैन्युअल के अनुसार नाश्ता, भोजन व अन्य सुविधाएं ही मिलती है।

यहां तक कि बंदियों को अपने परिजनों व वकीलों को पत्र तक लिखने का अधिकार जेल प्रशासन नहीं देता है, फिर कविता, कहानी व लेख लिखने के बारे में तो ज्यादातर बंदी सोच भी नहीं पाते हैं। यह सब बहुत मुश्किल है। आप काॅल के दौरान, मुलाकाती में अपनी बातें, कविताएं, अनुभव, अपनी परेशानियां साझा कर सकते हैं, वह भी कई बार समयाभाव के कारण टुकड़ों-टुकड़ों में।

बिहार-झारखंड के जेलों में रहते हुए मैंने यही जाना कि जेल एक यातनागृह है, जिसे सुधारगृह तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता है। जेल भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र है, यहां भ्रष्टाचार खुलेआम होता है। अगर आपके पास पैसा है, तो आपके लिए जेल भी स्वर्ग है और अगर आपके पास पैसा नहीं है, तो जेल आपके लिए नर्क से भी बदतर है।

जेल में इलाज के नाम पर सिर्फ धोखा होता है। अगर आप किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाएं, तो आपकी मौत जेल में ही निश्चित है, लेकिन आपकी मौत बाहर के अस्पताल में इलाज के दौरान ही दिखाई जाएगी।

मैं जब गिरफ्तार होकर सरायकेला डिस्ट्रिक्ट जेल में गया, तो वहां मुझे सेल के ऐसे कमरे में रखा गया, जिसके बगल के कमरों में कुष्ठ, टीबी व एड्स से पीड़ित बंदी थे और हम सभी का स्नानघर व शौचालय काॅमन था।

मेरे विरोध करने पर मुझे पुराने महिला वॉर्ड (भूत बंगला के नाम से प्रसिद्ध) में अकेले बंद कर दिया गया, जिसकी छत से बारिश में पानी टपकता था और पूरे कमरे में पानी ही पानी हो जाता था। नतीजा, मुझे एक कोने में बैठकर दिन-रात बितानी पड़ती थी। मेरे परिजनों द्वारा भेजे गए किताब, काॅपी व कलम को जेल प्रशासन ने मुझे देने से इंकार कर दिया। खाना बिल्कुल भी खाने लायक नहीं था। जब मैंने 15 अगस्त को भूख हड़ताल किया, तब जाकर मुझे काॅपी, किताब, कलम मिला, लेकिन मेरे जन्मदिन पर मेरे दोस्तों द्वारा मुझे भेजा गया पोस्टकार्ड भी नहीं दिया गया।

बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा होटवार (रांची) में तो मेरी लिखित किताब ‘कैदखाने’ का आइना’ भी परिजनों को मुझे नहीं देने दिया गया, कहा गया कि इसमें जेल व्यवस्था के खिलाफ बातें लिखी गई है, जबकि वह किताब अमेजन व फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। वहां के अधीक्षक हामिद अख्तर एक मुस्लिम थे, लेकिन उन्होंने जेल पुस्तकालय में मौजूद तस्लीमा नसरीन की सभी पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया था और उसे बंदियों को पढ़ने देने से मना कर दिया था।

बाद में, शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा,भागलपुर में भी मैंने देखा कि तस्लीमा नसरीन की कुछ पुस्तकों को जेल पुस्तकालय की पुस्तक की सूची में ही प्रतिबंधित कर दिया था, ताकि कोई बंदी इसकी मांग ना करे। बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में मैंने जेल प्रशासन से इतिहास में एमए करने की इच्छा जाहिर की, तो मुझे बताया गया कि यहां मात्र एनआईओएस से 10वीं व 12वीं की पढ़ाई की सुविधा है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार-झारखंड के किसी भी जेल में स्नातकोत्तर (एमए) की पढ़ाई की सुविधा इग्नू से भी नहीं है। इसलिए मुझे इग्नू के रामगढ़ (झारखंड) स्टडी सेंटर पर एमए में अपने निजी खर्च पर नामांकन लेना पड़ा।

तोड़ देती है सेल की ज़िंदगी

जेलों में सामान्य वॉर्ड के अलावा सेल (अंडा सेल, हाई सेक्युरिटी सेल आदि) भी होता है। मैं अपने 42 महीने के जेल में 33 महीने सेल में ही रहा हूं व वर्तमान में भी सेल में ही बंद हूं। सामान्य वॉर्ड के बंदियों को तो कुछ अधिकार भी हासिल है या कह सकते हैं कि कुछ सुविधाएं भी हासिल है, लेकिन सेल के बंदी अधिकांश सुविधाओं से महरूम है।

यहां मैं उन सुविधाओं की बात कर रहा हूं, जो शरीर और मस्तिष्क के स्वस्थ रहने के लिए हर इंसान के लिए जरूरी है, एक बंदी के रूप में दास जीवन बिताने वाले बंदियों के लिए भी।

सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल में आयोजित शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं, लेकिन सेल के बंदी नहीं ले सकते है। सामान्य वॉर्ड में टीवी व जेल रेडियो (बिहार के जेलों में) का स्पीकर लगा हुआ है, जिससे बंदियों का कुछ मनोरंजन हो जाता है, मानसिक तनाव में राहत मिलती है लेकिन सेल में ऐसी कोई सुविधा नहीं है। सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल पुस्तकालय में बैठकर पढ़ सकते हैं, लेकिन सेल के बंदी वहां नहीं बैठ सकते है। सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल के मैदान में खेल-कूद सकते हैं, पूरे जेल में घूम फिर सकते है, लेकिन सेल के बंदी सेल से बाहर नहीं निकल सकते हैं। कह सकते हैं कि सेल, जेल के भीतर एक जेल है।

सेल में आमतौर पर जेल प्रशासन ऐसे बंदियों को रखते हैं, जो सामान्य वॉर्ड में अवैध मोबाइल का इस्तेमाल करने, नशा करने व मारपीट करने के दोषी पाए जाते है। लेकिन अब सेल में ऐसे बंदियों को भी रखा जाने लगा है, जो अपने और बंदियों के अधिकारों के हनन पर उनके लिए आवाज उठाते है। उन्हें सेल में बंद कर उनसे सारा अधिकार छिन लिया जाता है।

वैसे बंदी, जो बंदी अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहते हैं, उन्हें प्रशासनिक लगाकर दूसरे जेलों में भी भेज दिया जाता है, जिन पर वहां पहुंचने के साथ ही जेल गेट से लेकर केंद्र स्थल (गुमटी) तक अनगिनत लाठी बरसती है।

जेलों में भ्रष्टाचार, पर सुनवाई नहीं

बिहार-झारखंड की जेलों में स्थानीय न्यायालय, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जब कोई बंदी वरीय अधिकारियों को जेल की भ्रष्ट व्यवस्था की शिकायत करते हैं, तो जेल प्रशासन अपने दलाल बंदियों के बयानों को कलमबद्ध कर रिपोर्ट बनाकर भेज देते हैं कि जेल में सब कुछ सही है। अगर कभी जांच के लिए अधिकारी आ जाए, तो जेल अधिकारी उन्हें अपने दलाल बंदियों से ही सिर्फ मिलाते हैं, बाकि बंदियों को अपने-अपने वॉर्ड में बंद कर देते है।

अभी 18 जनवरी 2026 को पटना हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू, जेल आईजी प्रणव कुमार समेत कई अधिकारी आदर्श सेंट्रल जेल में आए और जेल का निरीक्षण किया, जिस दौरान सभी बंदियों को अपने-अपने वॉर्ड में बंद कर दिया गया और उन्हीं लोगों से मुखातिब करवाया गया, जो जेल प्रशासन की दलाली करते है। बाकी हमारे जैसे सामान्य बंदी तो कभी उनके सामने नहीं लाए जाते हैं।

मैंने इस जेल में व्याप्त भ्रष्टाचार व बंदियों के शोषण और दमन पर एक आवेदन पटना डीएम को 15 दिसंबर 2025 को भेजा है, जिसकी प्रतिलिपि बिहार के उप-मुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को भी भेजा है, जिस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जेल में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, इसे चालू रखने के लिए आवाज उठाने वाले बंदियों के अधिकारों को छिना जाता है और चूंकि इन पर कभी अंकुश नहीं लगता, इसलिए आश्वस्त होकर ये भ्रष्टाचार में लिप्त है। वैसे भी, जेल में यह बात प्रचलित है कि जेल प्रशासन अपने भ्रष्टाचार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा मंत्रियों व वरीय अधिकारियों को भी देता है, इसलिए वे कोई कार्यवाही नहीं करते। फिर भी अगर कोई जांच टीम आ भी जाए, तो एक मोटी रकम देकर जेल प्रशासन सब मैनेज कर लेती है।

मैं कुछ महीने से उच्च (बैड) काॅलेस्ट्रॉल, उच्च ट्राईग्लिसराइड्स, एलर्जी, एल 5 डिस्क स्लिप व याद्दाश्त कम होने की समस्याओं से पीड़ित हूं। पटना के स्पेशल एनआईए कोर्ट द्वारा आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) के अधीक्षक को मेरे इलाज के लिए 11 दिसंबर 2025 को लिखित आदेश दिया गया है, लेकिन जेल प्रशासन द्वारा अब तक कोई उपचार नहीं कराया गया है। इससे पहले 01 नवंबर 2025 को भी इलाज के लिए आदेश जेल प्रशासन को कोर्ट द्वारा दिया गया था।

इससे पहले भी स्वास्थ्य समस्या को लेकर कोर्ट में अर्जियां लगाई गई थीं, तब मैं भागलपुर शहीद जुब्बा सहनी सेंट्रल जेल में था। वहां कोर्ट आदेश होने के बाद व स्वास्थ्य समस्या को लंबे समय झेलने के बाद अस्पताल में दिखाया गया था। पर बेऊर जेल प्रशासन उससे भी आगे निकल चुका है, लंबे वक्त व दो- दो बार कोर्ट आदेश के बाद भी इनके कानों में जूं तक नहीं रेंगा।

यह कोई नया नहीं है। मेरे इतने सालों का अनुभव यही कहता है कि किसी मामले में कोर्ट में आदेश होने के बाद भी जेल प्रशासन अक्सर उसका पालन नहीं करती है और बार-बार आर्डर देकर कोर्ट भी थक जाता है। इस तरह बंदियों के बहुतेरे मामले पेंडिंग ही रह जाते है या फिर एक थका देने वाले समय के बाद अमल में आते है। पूरे देश के न्यायालय के लिए ऐसा कोई क्षेत्राधिकार नहीं है, जो कि जेल के मनमाने पर न्यायालय की प्रबलता स्थापित कर सके और जेलों के बंदियों के अधिकारों को बचा सके।

आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) के अधीक्षक की तानाशाही तो इस कदर है कि वे बंदियों के द्वारा न्यायालय के नाम भेजे गए आवेदन को भी न्यायालय को नहीं भेजते हैं। बंदियों को ‘बंदी आवेदन पत्र’ देने से साफ इंकार कर देते है।

74 वर्षीय माओवादी नेता प्रमोद मिश्रा सेल में मेरे कमरे के बगल वाले कमरे में ही है, उन्होंने दिसंबर 2025 में ‘बंदी आवेदन पत्र’ पर स्पेशल एनआईए कोर्ट, पटना, स्पेशल एनआईए कोर्ट, रांची व प्रधानमंत्री के नाम से आवेदन जेल कार्यालय को सुपुर्द किया, लेकिन जेल प्रशासन ने इन तीनों में से एक भी आवेदन को आगे नहीं भेजा। फलतः उन्होंने 26 जनवरी 2026 से अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल की घोषणा कर दी है, लेकिन अब उन्हें बंदी आवेदन पत्र भी नहीं दिया जा रहा है।

‘मधुकर भगवान संभाले बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य’ (1987) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘‘हम यह समझने में असफल रहे हैं कि कैदी को जेल प्रशासन के खिलाफ अपनी शिकायतों को अपने पत्र के माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने क्यों नहीं रखना चाहिए …. . दोषसिद्धि और जेल में बंद होने के कारण, कैदी राजनीतिक अधिकारों को नहीं खोता है।’

क्या इस ‘गणतंत्र’ के बंदियों को सुप्रीम कोर्ट के कथनानुसार व संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार कभी हासिल होगा? ‘जेल अपवाद है व जमानत नियम,’ यह धरातल पर फलीभूत कभी होगा या जेलों के यातनागृह में बंदियों को पीसकर भ्रष्ट अधिकारियों के पौ-बारह होते रहेंगे?
क्या सच्चे गणतंत्र को स्थापित करने के लिए भारतीय जनता सड़कों पर उतरेगी? इसका जवाब ही ‘गणतंत्र’ के बंदियों का भविष्य तय करेगा।