कोहरा, धुंध या स्मॉग? जानिए कौन आपकी सेहत और फेफड़ों के लिए है सबसे खतरनाक

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। सर्दियों की सुबह खिड़की खोलते ही चारों तरफ सफेद या धूसर चादर दिखाई देती है। सड़कें धुंधली नजर आती हैं, दूर खड़े पेड़ और मकान भी मुश्किल से दिखाई देते हैं। ऐसे में ज्यादातर लोग इसे सामान्य कोहरा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सावधान! हर बार आसमान में छाई यह धुंध सिर्फ मौसम का असर नहीं होती। कई बार इसके पीछे हवा में घुले प्रदूषण के खतरनाक कण भी छिपे हो सकते हैं, जो धीरे-धीरे आपके फेफड़ों और दिल की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि कोहरा, धुंध और स्मॉग देखने में भले ही एक जैसे लगें, लेकिन इनके बनने का तरीका और सेहत पर पड़ने वाला असर अलग-अलग होता है। इसलिए केवल आसमान देखकर हवा को साफ मान लेना बड़ी भूल हो सकती है।

कोहरा मुख्य रूप से तब बनता है, जब हवा में मौजूद नमी ठंड के कारण पानी की बेहद छोटी बूंदों में बदल जाती है। रात में तापमान गिरने, हवा की गति धीमी रहने और नमी अधिक होने पर सुबह घना कोहरा छा सकता है। इसकी वजह से सड़क पर वाहन चलाना मुश्किल हो जाता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, कोहरा होने का मतलब यह नहीं कि उस समय प्रदूषण का स्तर भी बहुत अधिक है।

धुंध की कहानी थोड़ी अलग है। हवा में मौजूद धूल, धुआं और दूसरे सूक्ष्म कण सूरज की रोशनी को बिखेर देते हैं। इसके कारण दूर की चीजें साफ दिखाई नहीं देतीं और आसमान का रंग फीका या मटमैला नजर आने लगता है। अगर हवा में प्रदूषण के कण अधिक मात्रा में मौजूद हैं, तो धुंध और गहरी दिखाई दे सकती है। यही वजह है कि कई बार धूप निकलने के बावजूद वातावरण साफ नहीं दिखता।

अब समझिए स्मॉग का असली खतरा। स्मॉग शब्द धुएं और कोहरे से मिलकर बना है। इसे प्रदूषण से जुड़ी धुंध के रूप में समझा जा सकता है। इसमें हवा के सूक्ष्म प्रदूषक कण और जमीन के पास मौजूद ओजोन जैसी हानिकारक गैसें शामिल हो सकती हैं। कुछ प्रकार का स्मॉग सूरज की रोशनी में प्रदूषकों के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनता है, जबकि अन्य स्थितियों में वाहनों, उद्योगों और ईंधन जलने से निकला प्रदूषण वातावरण में जमा होता रहता है।

सर्दियों में उत्तर भारत के कई इलाकों में कोहरा और स्मॉग एक साथ दिखाई देने की वजह भी यही है। कम तापमान, अधिक नमी और धीमी हवा कोहरे के बनने में मदद करते हैं। दूसरी ओर, हवा की गति कम होने पर प्रदूषक कण आसानी से बिखर नहीं पाते और जमीन के आसपास जमा होने लगते हैं। इससे वातावरण में धूसर परत छा सकती है और सांस लेने वाली हवा की गुणवत्ता खराब हो सकती है।

सेहत के लिहाज से सबसे बड़ी चिंता हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे बेहद महीन कण हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक या अधिक मात्रा में इनके संपर्क में रहने से सांस संबंधी परेशानी और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। अस्थमा, फेफड़ों या दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों, बुजुर्गों और बच्चों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

इसका मतलब यह नहीं कि हर बार दिखाई देने वाली धुंध खतरनाक प्रदूषण का ही संकेत है। वास्तविक जोखिम जानने के लिए हवा की गुणवत्ता की जांच जरूरी है। इसी तरह, आसमान साफ दिखने पर भी हवा में ऐसे प्रदूषक मौजूद हो सकते हैं, जिन्हें नंगी आंखों से देखना संभव नहीं है।

अगर सुबह बाहर निकलते समय हवा धुंधली दिखाई दे रही है, तो सबसे पहले अपने क्षेत्र का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI जांचें। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की आधिकारिक वेबसाइट या संबंधित सरकारी वायु गुणवत्ता सेवाओं का सहारा लिया जा सकता है। प्रदूषण अधिक होने पर खुले में कठिन व्यायाम करने से बचें और स्थानीय प्रशासन की स्वास्थ्य संबंधी सलाह का पालन करें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार सावधानी बरतें।

याद रखें, कोहरा मुख्य रूप से पानी की छोटी बूंदों से बनता है, धुंध हवा में मौजूद कणों के कारण दिखाई देती है और स्मॉग प्रदूषण से जुड़ी समस्या है। ये तीनों कभी-कभी एक साथ नजर आ सकते हैं, लेकिन इनका असर एक जैसा नहीं होता। अगली बार सर्दियों की सुबह बाहर सफेद चादर दिखाई दे, तो उसे सामान्य मौसम मानकर अनदेखा न करें। अपनी सेहत की सुरक्षा के लिए मौसम की जानकारी के साथ AQI भी जरूर जांचें। आखिर साफ दिखाई देने वाली हवा और साफ-सुथरी हवा में फर्क हो सकता है।