
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के दौरान लगाई गई सख्त पाबंदियों को लेकर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में सफाई देनी पड़ी है। केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने 9 अक्टूबर को रायसीना हिल के आसपास लागू प्रतिबंधों के मामले में शीर्ष अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगते हुए अपने खिलाफ चल रही अवमानना की कार्यवाही समाप्त करने का अनुरोध किया है। सरकार का कहना है कि प्रतिबंध लगाने के पीछे कानून-व्यवस्था बनाए रखना और संभावित अव्यवस्था को रोकना मुख्य उद्देश्य था। यह विवाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही थी। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था। इसी दौरान सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर राजधानी के संवेदनशील इलाकों में कई सख्त कदम उठाने का प्रस्ताव सामने आया, जिस पर कानूनी सवाल खड़े हो गए। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, प्रशासन की योजना में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, यातायात नियंत्रित करने और प्रभावित क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने जैसे कदम शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए निर्देश दिया कि आवश्यक सेवाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध न लगाया जाए और आम लोगों को अनावश्यक परेशानी से बचाया जाए। इस घटनाक्रम ने विरोध-प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की सुविधाओं के बीच संतुलन का सवाल फिर चर्चा में ला दिया है। गृह सचिव गोविंद मोहन ने अदालत में दाखिल हलफनामे में बताया कि दिल्ली पुलिस ने राजधानी की परिस्थितियों को देखते हुए एक दिन के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद करने का अनुरोध किया था। उनके अनुसार, इस अनुरोध पर निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की गई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिबंध मोबाइल इंटरनेट सेवाओं तक सीमित था; ब्रॉडबैंड और वाई-फाई सेवाओं पर रोक नहीं लगाई गई थी। हलफनामे में बताया गया कि प्रतिबंध 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में लागू था। गृह सचिव ने अदालत से अनुरोध किया है कि उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही समाप्त की जाए। साथ ही, उन्होंने 11 अक्टूबर के आदेश में संशोधन की मांग करते हुए कहा कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर इंटरनेट सेवाओं को बंद करने की अनुमति दी जाए, लेकिन ऐसा करते समय कानूनी सुरक्षा उपायों का पूरा पालन किया जाए। इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर प्रशासन कितनी व्यापक पाबंदियां लगा सकता है और ऐसे फैसलों से आम नागरिकों, यात्रियों, कारोबारियों तथा डिजिटल सेवाओं पर पड़ने वाले असर को किस तरह सीमित रखा जा सकता है। इंटरनेट आज शिक्षा, कारोबार, बैंकिंग और आपातकालीन संचार का अहम माध्यम है। ऐसे में किसी भी प्रतिबंध का औचित्य, उसका दायरा और उसकी अवधि सार्वजनिक हित की कसौटी पर परखे जाने की जरूरत है। इसी बीच, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई निर्धारित होने की बात कही गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं की याचिका में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग उठाई गई है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया है। इसमें तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य प्रतिष्ठित नागरिकों को शामिल करने की मांग की गई है, ताकि SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए नामों और किए गए बदलावों का निर्धारित समय-सीमा में स्वतंत्र ऑडिट हो सके। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि पात्र मतदाताओं के अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता की रक्षा के लिए संबंधित मुद्दों पर फैसला होने तक विभिन्न राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने पर विचार किया जाए। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के आरोप और उनकी मांगें अदालत के अंतिम निष्कर्ष के समान नहीं हैं; इन पर न्यायिक सुनवाई के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी। रायसीना हिल का प्रतिबंध विवाद और SIR से जुड़ी याचिका दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता और चुनावी पारदर्शिता के महत्व को सामने लाते हैं। सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन प्रतिबंधों का इस्तेमाल कानून के दायरे में, आवश्यक सीमा तक और उचित कारणों के साथ होना चाहिए। वहीं, मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि किसी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके निर्देशों पर टिकी हैं।
