लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी इन दिनों उबाल पर है। चाय की चुस्की हो या कॉरिडोर की खुसुर-पुसुर, चर्चा का विषय एक ही है – “टॉप बॉस की कुर्सी किसे मिलेगी?”
बैठक से लेकर मुलाकातों तक अफसरों के बीच गूंजता सवाल है – “पार्टनर, क्या सीन है?”
दरअसल, राज्य की प्रशासनिक मशीनरी के मुखिया की कुर्सी को लेकर रस्साकशी चरम पर है। मौजूदा टॉप बॉस के सेवा विस्तार की फाइल दिल्ली की दहलीज़ पर दस्तक दे चुकी है, और चर्चा है कि वो इसे मंजूर करवाने में माहिर माने जाते हैं। राजनीतिक और नौकरशाही दोनों के समीकरणों को साधने में उनकी कुशलता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्य प्रतिद्वंद्वी अफसर की नाक के नीचे से सेवा विस्तार प्रस्ताव निकल गया, और भनक तक नहीं लगी।
शक्ति के दो ध्रुवों की सीधी टक्कर
इस कुर्सी की लड़ाई अब दो ध्रुवों के बीच सीधी हो चुकी है। एक तरफ मौजूदा मुखिया का अनुभव और रणनीतिक पकड़ है, तो दूसरी तरफ प्रतिद्वंद्वी की प्रतिष्ठा और समर्थकों की लंबी फेहरिस्त। दोनों खेमों के समर्थक अफसर असमंजस में हैं – किस पाले में जाएं या तटस्थ रहकर नतीजे का इंतजार करें?
दिल्ली के दरवाजे पर टिकी निगाहें
फिलहाल गेंद केंद्र के पाले में है। लेकिन खबरें यह भी हैं कि शीर्ष स्तर पर बैठा एक और सशक्त नाम मुकाबले में मजबूती से बना हुआ है। हालिया उठे सवालों और आरोपों को कागजों के माध्यम से नकारने के बाद उनके पक्ष में बनी सकारात्मक हवा ने भी उनकी टीम का मनोबल बढ़ा दिया है।
‘तीसरा नाम’ भी दौड़ में – समीकरण बदलने की संभावना
इस दोतरफा मुकाबले के बीच एक तीसरे नाम की भी चर्चा शुरू हो गई है। यह अफसर अब तक चुपचाप अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे, लेकिन अगर पहले दो में से किसी की भी फाइल में अड़चन आती है, तो यह ‘दीपक’ भी उम्मीदों की लौ जगा सकता है।
राजनीतिक परिस्थितियों और ब्यूरोक्रेटिक समीकरणों के बीच तीसरे नाम का उभरना तमाम संभावनाओं को नई दिशा दे सकता है।
आखिरी फैसला तय करेगा ब्यूरोक्रेसी का मिजाज
टॉप बॉस की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इसका फैसला न केवल प्रशासनिक ढांचे की दिशा तय करेगा, बल्कि उसके बाद सचिवालय से लेकर जिलों तक अफसरशाही में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। इसलिए सभी की निगाहें दिल्ली की मोहर पर टिकी हैं। आने वाले कुछ दिन ब्यूरोक्रेसी की दिशा और दशा तय करने वाले साबित होंगे।
