भारत में युवाओं की बड़ी आबादी को लंबे समय से “डेमोग्राफिक डिविडेंड” के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन मौजूदा हालात इस उम्मीद पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी दर 40% तक पहुंच गई है, जो देश के रोजगार ढांचे की कमजोरियों को उजागर करती है।
आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
• 15–29 वर्ष के युवाओं की संख्या: 36.7 करोड़
• संभावित कार्यबल: 26.3 करोड़
• स्नातक या उससे अधिक शिक्षित: 6.3 करोड़
• बेरोज़गार स्नातक: 1.1 करोड़
यह साफ दर्शाता है कि देश में शिक्षा और रोजगार के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया है।
कृषि की ओर लौटता रोजगार – विकास की उलटी दिशा
आर्थिक विकास में सामान्यतः लोग कृषि से उद्योग और सेवा क्षेत्र की ओर जाते हैं, लेकिन भारत में उल्टा रुझान दिख रहा है।
2021-24 के बीच बने 8.2 करोड़ नए रोजगारों में से करीब 4 करोड़ कृषि क्षेत्र में जुड़े। यह दर्शाता है कि लोग मजबूरी में कम आय वाले क्षेत्रों की ओर लौट रहे हैं।
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महिलाओं की भागीदारी – मजबूरी या सशक्तिकरण?
कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन यह सशक्तिकरण नहीं बल्कि मजबूरी का संकेत है।
अधिकतर महिलाएं बिना वेतन के पारिवारिक कार्यों में जुड़ी हैं या छोटे स्तर पर स्वरोज़गार कर रही हैं।
शिक्षा पर घटता भरोसा
• पिछले वर्षों में शिक्षा में दाखिला बढ़ा, लेकिन अब गिरावट देखने को मिल रही है
• 72% युवाओं ने पढ़ाई छोड़ने का कारण आर्थिक दबाव बताया
यह दिखाता है कि युवा अब शिक्षा को रोजगार की गारंटी नहीं मान रहे।
डिमांड-सप्लाई का असंतुलन
समस्या की जड़ है:
• नौकरी की कमी
• शिक्षित युवाओं की अधिकता
इस कारण:
• ग्रेजुएट युवाओं को कम स्किल वाली नौकरी करनी पड़ रही है
• सैलरी कम हो रही है
• स्किल का मूल्य घट रहा है
डेमोग्राफिक डिविडेंड बन सकता है संकट
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन यदि उन्हें रोजगार नहीं मिला तो यही ताकत संकट में बदल सकती है।
सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह समय है कि वे:
• रोजगार सृजन पर ध्यान दें
• स्किल आधारित शिक्षा को बढ़ावा दें
• उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करें
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