उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती में आयु सीमा को लेकर उठा सवाल अब केवल एक नियम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हजारों युवाओं के भविष्य और समान अवसर से जुड़ा विषय बन गया है। वर्षों से कठिन परिश्रम कर रहे अनेक अभ्यर्थी सिर्फ आयु सीमा के कारण भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो रहे हैं, जबकि उनकी योग्यता, शारीरिक क्षमता और सेवा-भाव में कोई कमी नहीं है।
आयु और देह किसी जाति, वर्ग या समुदाय को नहीं पहचानती। उम्र सबकी समान गति से बढ़ती है। ऐसे में पुलिस भर्ती जैसी महत्वपूर्ण सेवा में आयु सीमा की छूट को अलग-अलग वर्गों में बांटना समानता की भावना के विपरीत प्रतीत होता है। पुलिस सेवा अनुशासन, समर्पण और जनसेवा की मांग करती है, न कि सामाजिक पहचान की।
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में निकली पुलिस भर्तियों में आयु सीमा बढ़ाने की मांग तेज हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से विधायक शलभ मणि त्रिपाठी सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने अनुरोध किया है कि आयु सीमा में यथोचित बढ़ोतरी की जाए। उनका कहना है कि इससे वर्षों से भर्ती की तैयारी में जुटे हजारों युवाओं को एक और अवसर मिल सकेगा और वे अपनी मेहनत का वास्तविक मूल्यांकन करा पाएंगे।
आज की वास्तविकता यह है कि आर्थिक तंगी, पारिवारिक जिम्मेदारियों, संसाधनों के अभाव और रोजगार की तलाश के कारण अनेक युवा समय पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी नहीं कर पाते। यह समस्या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। ऐसे में आयु सीमा में छूट यदि दी जानी है, तो वह सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को समान रूप से मिलनी चाहिए।
पुलिस भर्ती में समान आयु सीमा और समान छूट न केवल प्रतियोगिता को निष्पक्ष बनाएगी, बल्कि चयन प्रक्रिया में जनता और युवाओं का विश्वास भी बढ़ाएगी। योग्यता, परिश्रम और क्षमता को ही चयन का आधार बनाना ही एक मजबूत और संवेदनशील प्रशासन की पहचान है।
अंततः जब उम्र और देह कोई भेदभाव नहीं मानती, तो पुलिस भर्ती की नीति को भी समानता और न्याय के सिद्धांतों पर खरा उतरना चाहिए।
पुलिस भर्ती में आयु सीमा: समानता की कसौटी
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