शिक्षा बनी व्यापार, बच्चों की किताब-कॉपी तक से वसूली जारी
(संत कबीर नगर से नवनीत मिश्र की रिपोर्ट)
संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। शिक्षा के बाजारीकरण ने अब ऐसे रूप ले लिए हैं कि अभिभावकों की जेब पर सीधा वार हो रहा है। जहाँ एक ओर सरकार परिषदीय विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर निजी विद्यालयों की मनमानी पर कोई रोक नजर नहीं आ रही है। नतीजा यह है कि हजारों अभिभावक हर महीने अपने बच्चों की फीस, ड्रेस, किताब और जूते-मोजों के नाम पर हो रही बेहिसाब वसूली से त्रस्त हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार में निजी विद्यालयों की फीस 300 रुपये महीने से शुरू होकर 5000 रुपये तक पहुँच चुकी है, वह भी प्राइमरी स्तर पर। यही नहीं, कई विद्यालयों में किताबें, कॉपियां, ड्रेस, जूते, मोजे और यहां तक कि त्योहारों पर होने वाले कार्यक्रमों के लिए भी अलग से जबरन पैसे वसूले जा रहे हैं।
चिंताजनक बात यह है कि यह पूरा खेल जिम्मेदारों की जानकारी में चल रहा है, लेकिन कोई ठोस कार्यवाही होती नहीं दिख रही। न तो जिला प्रशासन ने अब तक इस दिशा में कोई स्पष्ट नीति लागू की है, न ही शिक्षा विभाग के अधिकारी इस मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए तैयार दिखते हैं।
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा अब आवश्यकता नहीं, एक महंगा सौदा बन गई है, जिसे आम आदमी के लिए निभा पाना मुश्किल होता जा रहा है। कई मामलों में विद्यालय अपनी अनुशंसित दुकानों से ही सामान खरीदने का दबाव बनाते हैं, जिससे अभिभावकों को बाज़ार से कहीं ज़्यादा दाम चुकाने पड़ते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राथमिक शिक्षा को इस तरह से व्यवसायिक बना दिया जाएगा तो “विकसित भारत” का सपना कैसे साकार होगा? बच्चों की बुनियादी शिक्षा यदि आम जनता की पहुंच से दूर होती गई, तो समाज में असमानता और भी गहराएगी।
जनता की माँग है कि शासन इस गंभीर मुद्दे पर जल्द संज्ञान ले और एक पारदर्शी एवं जवाबदेह व्यवस्था सुनिश्चित करे, ताकि शिक्षा हर वर्ग तक सुलभ और सस्ती रह सके।
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