भाषाई शब्द ऐसे परिधान होते हैं
जिन्हें शालीनता से पहना जाता है,
शालीनता त्याग देते ही इंसान का
सारा व्यक्तित्व निर्वस्त्र हो जाता है।
शिक्षा एवं उससे मिले संस्कार
मानव जीवन के मूल मंत्र होते हैं,
शिक्षा मानव का सम्मान बढ़ाती है,
तो संस्कार मस्तक ऊँचा कर देते हैं।
जिस तरह नज़दीक जाने से कुछ
चीजें बिन मांगे ही मिल जाती हैं,
बर्फ के पास जाने से जैसे शीतलता,
अग्नि समीप जाने से गर्मी मिलती है।
जैसे फूलों के पास जाने से सुगंध,
तो प्रभू से माँगने की क्या जरूरत,
केवल उनसे निकटता बनाइये,
सब कुछ बिन माँगे पा जाइये।
पुनर्जन्म होता है, याद किसे रहता है,
जन्म मृत्यु पर यही प्रश्नचिन्ह उठता है,
इस परिवर्तनशील संसार में मृत्यु
के उपरांत कौन कहाँ जन्म लेता है।
याददाश्त का कमजोर होना
इतना भी बुरा नहीं होता है,
जिसे हर बात याद रहती है,
वह भी तो बेचैन ही रहता है।
याददाश्त का मज़बूत होना
इतना अच्छा भी नहीं होता है,
जिसने उधार दिया याद होता है,
वह क्या ज़्यादा चैन से सोता है।
देने वाला किसी का बुरा नहीं चाहता,
किसी को हाय या बद्दुआ भी देता नहीं,
वह वापस माँग लेता है बस एक बार,
निर्भर है लेने वाला याद रखे या नहीं।
आदित्य आनंद वहाँ नहीं मिलता है,
जहाँ धन देकर वापस मिलता है,
मन का आनन्द वहीं पर मिलता है,
सच्चे मन से सच्चा मन मिलता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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