लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे अखिलेश यादव, भीड़ से लेकर नेताओं की अनुशासनहीनता तक पर सख्त रुख

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अब आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं चाहते। पार्टी संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और नेताओं के बीच अनुशासन कायम करने के लिए लगातार सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। हालात यह हैं कि करीब एक महीने के भीतर उत्तर प्रदेश की कई जिला इकाइयों और उत्तराखंड की संगठनात्मक इकाइयों को भंग करने का फैसला सामने आया है। कन्नौज में पीडीए सम्मेलन के दौरान अपेक्षित भीड़ नहीं जुटने और गोरखपुर में पार्टी पदाधिकारियों के बीच विवाद जैसे घटनाक्रमों ने संगठन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं।
पार्टी नेतृत्व की ओर से नेताओं और कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक बयानबाजी, सोशल मीडिया पर सक्रियता और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं। संदेश साफ है कि चुनावी तैयारी में लापरवाही और अनुशासनहीनता को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
कन्नौज को समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है। ऐसे में वहां आयोजित पीडीए सम्मेलन में कुर्सियां खाली रहने की तस्वीरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी। सम्मेलन में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटने के बाद जिला संगठन पर कार्रवाई की गई। अखिलेश यादव के निर्देश पर प्रदेश अध्यक्ष ने जिलाध्यक्ष सहित पूरी जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी अब अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी संगठन की सक्रियता को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
खाली कुर्सियों के मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री असीम अरुण और पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने भी अखिलेश यादव तथा समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा था। राजनीतिक विरोधियों के हमलों के बीच जिला इकाई को भंग किए जाने से सपा के संगठनात्मक प्रबंधन पर बहस और तेज हो गई है।
गोरखपुर में भी पार्टी को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था, जब तीन अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के पदाधिकारियों के बीच प्रेस वार्ता के दौरान विवाद और मारपीट की घटना सामने आई। शास्त्री चौक स्थित गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में जिलाध्यक्ष ब्रजेश गौतम, महानगर अध्यक्ष शब्बीर कुरैशी, पूर्व विधायक विजय बहादुर यादव सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
इसी दौरान बांसगांव के पूर्व चेयरमैन अंशुमान सिंह अपने समर्थकों के साथ पहुंचे। आगे की कतार में बैठने को लेकर उनके समर्थकों और पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना साहनी के बीच विवाद हो गया। देखते ही देखते कहासुनी ने हाथापाई का रूप ले लिया। पत्रकारों के सामने हुए इस घटनाक्रम से मौके पर अफरा-तफरी मच गई। बताया गया कि पूरी घटना वहां मौजूद पत्रकारों के कैमरों में भी कैद हुई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और पार्टी पदाधिकारियों ने बीच-बचाव कर स्थिति संभाली।
घटना की जानकारी पार्टी नेतृत्व तक पहुंचने के बाद संगठनात्मक स्तर पर कार्रवाई की गई। गोरखपुर की जिला और महानगर कार्यकारिणियों को भंग कर दिया गया। इसके साथ ही वहां पार्टी के विभिन्न फ्रंटल संगठनों को भी भंग करने के निर्देश जारी किए गए। इस कदम को संगठन में अनुशासन कायम करने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
गोरखपुर और कन्नौज के अलावा कासगंज तथा एटा की जिला इकाइयों के पदाधिकारियों को भी हटाया जा चुका है। वहीं, उत्तराखंड में सभी जिला इकाइयों को भंग किए जाने की जानकारी सामने आई है। लगातार हो रही इन कार्रवाइयों से पार्टी के भीतर संगठनात्मक फेरबदल और नई टीमों के गठन को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
राजनीतिक जानकारों के नजरिये से देखें तो विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करना, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी सुनिश्चित करना और नेताओं के बीच तालमेल बनाए रखना सपा के लिए अहम चुनौती है। पीडीए की राजनीतिक रणनीति को जमीन पर प्रभावी बनाने के लिए सम्मेलनों में भीड़ जुटाने से लेकर जनता के बीच पार्टी की मौजूदगी मजबूत करने तक कई मोर्चों पर काम करना होगा।
अखिलेश यादव के हालिया कदमों से यह संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व संगठन की कमजोरियों को दूर करने और चुनावी तैयारी को गति देने पर जोर दे रहा है। हालांकि, भंग की गई इकाइयों की जगह नई टीमों का गठन किस तरह होता है और उसका जमीनी स्तर पर कितना असर पड़ता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल, एक के बाद एक संगठनात्मक कार्रवाई से समाजवादी पार्टी में हलचल तेज है और नेताओं की नजर अब नेतृत्व के अगले फैसले पर टिकी है।
