रावण की व्यथा के बहाने आधुनिक समाज के दोहरे चरित्र पर तीखा प्रहार

प्रस्तुतकर्ता: संजय एम. तराणेकर
✍️ विशेष कविता
प्रभु श्रीराम! सुनो पुकार, क्यों सहूँ मैं अग्नि की मार?
हर साल मुझे जलाते हो, फिर अगले साल बुलाते हो!
मैं रावण हूँ और दशानन हूँ,
अपने युग का मैं दर्पण हूँ।
कहते हो, मैं पापी हूँ,
लेकिन आज भी क्यों व्यापी हूँ?
मेरे दस सिर अहंकार के,
सिर लोभ व भ्रष्टाचार के थे।
परंतु आज सिरों की गिनती नहीं,
पापों की सीमा नहीं!
मैंने सीता का हरण किया,
अपने कुल का पतन किया।
आज इंसान ही इंसान को,
लोभ में बेच रहा ईमान को।
मेरे भीतर अहंकार था,
लेकिन ज्ञान का भी भंडार था।
आज ज्ञान की बातें करनेवाले,
मुखौटे हैं पहनने वाले!
मैं लंका का राजा कहलाया,
सोने का साम्राज्य बनाया।
आज बिना सोने की लंका के,
बहुत रावण हैं सत्ता के!
🖋️ कवि परिचय
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर–452011, मध्य प्रदेश
📰 कविता का संदेश
रावण का पुतला जलाना आसान है, लेकिन अपने भीतर के अहंकार, लोभ, भ्रष्टाचार और छल को जलाना कठिन। यह कविता समाज के उस दोहरे चरित्र पर सवाल उठाती है, जहाँ हर साल रावण का दहन तो होता है, मगर बुराइयाँ आज भी जीवित रहती हैं।
सच्चा रावण-दहन तभी होगा, जब हम अपने भीतर की बुराइयों का अंत करेंगे।
