पुतलों का दहन नहीं, मन और समाज में छिपी बुराइयों का संहार ही दशहरे का असली संदेश

लेखक: डॉ. सत्यवान सौरभ

हर साल दशहरे की शाम रावण के विशाल पुतले धू-धू कर जलते हैं। आतिशबाजी की चमक, पटाखों की गूंज और दर्शकों की तालियों के बीच बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। कुछ ही मिनटों में रावण का पुतला राख हो जाता है और लोग विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए अपने घर लौट जाते हैं। लेकिन एक सवाल हर साल हमारे सामने खड़ा रहता है—यदि रावण सचमुच मर रहा है, तो समाज में बुराइयां लगातार बढ़ क्यों रही हैं? आखिर हर साल जलने वाला रावण कौन है और हर साल नए रूप में खड़ा होने वाला रावण कौन?

दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व या मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का पर्व है। रावण दहन का वास्तविक उद्देश्य हमें यह याद दिलाना है कि अहंकार, अन्याय, छल, लोभ और अनैतिकता चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः उनका पतन निश्चित है। लेकिन विडंबना देखिए कि हमने इस संदेश को एक वार्षिक आयोजन तक सीमित कर दिया है। पुतले बड़े होते जा रहे हैं, आयोजन भव्य होते जा रहे हैं और आतिशबाजी पर खर्च बढ़ रहा है, लेकिन क्या हमारे भीतर की बुराइयां उसी अनुपात में कम हो रही हैं?

रामायण का रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और शिवभक्त भी था। उसके व्यक्तित्व में अनेक गुण थे, लेकिन अहंकार और पराई स्त्री के अपहरण जैसे गंभीर अधर्म ने उसकी समस्त उपलब्धियों को व्यर्थ कर दिया। उसका अंत इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव भी मनुष्य को महान नहीं बना सकते, यदि उसके आचरण में मर्यादा और नैतिकता का अभाव हो। रावण की पराजय हमें सिखाती है कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी विद्वत्ता या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्मों से होती है।

आज का रावण किसी एक चेहरे या पात्र का नाम नहीं है। वह उस मानसिकता का प्रतीक है, जो दूसरों के अधिकारों का हनन करती है, कमजोरों का शोषण करती है और अपने स्वार्थ के लिए नैतिकता को ताक पर रख देती है। जब किसी बेटी की अस्मिता पर हमला होता है, जब दहेज के लिए किसी बहू को प्रताड़ित किया जाता है, जब रिश्वत लेकर न्याय और अधिकारों का सौदा होता है, जब नशा किसी परिवार को उजाड़ देता है और जब लालच में रिश्तों का खून होता है, तब समझ लेना चाहिए कि रावण किसी पुतले में नहीं, हमारी सामाजिक व्यवस्था और मानवीय सोच में जीवित है।

विडंबना यह भी है कि हम बुराई को पहचानने में जितनी तत्परता दूसरों के मामले में दिखाते हैं, उतना साहस अपने भीतर झांकने में नहीं दिखाते। दूसरों का अहंकार हमें तुरंत दिखाई देता है, लेकिन अपना अहंकार स्वाभिमान लगने लगता है। दूसरों का छल हमें अपराध लगता है, लेकिन अपने स्वार्थ के लिए किया गया समझौता व्यावहारिकता कहलाता है। दूसरों की गलती पर हम कठोर निर्णय सुनाते हैं, जबकि अपनी गलतियों के लिए सौ बहाने खोज लेते हैं। यही दोहरा चरित्र भीतर के रावण को जीवित रखता है।

आज समाज में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, नशाखोरी और नैतिक मूल्यों का क्षरण जैसी समस्याएं गंभीर चिंता का विषय हैं। इनके समाधान के लिए केवल धार्मिक आयोजन पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए परिवार, विद्यालय, प्रशासन और समाज—सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। बच्चों को केवल अच्छे संस्कारों का उपदेश देना पर्याप्त नहीं; उन्हें अपने व्यवहार में ईमानदारी, संवेदनशीलता और समानता के उदाहरण भी दिखाई देने चाहिए। कानून का भय आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि मनुष्य के भीतर सही और गलत के बीच अंतर करने वाली नैतिक चेतना जीवित रहे।

दशहरे का एक बड़ा संकट यह है कि हमने प्रतीकों को महत्व देना शुरू कर दिया है, जबकि उनके पीछे छिपे मूल्यों को अपनाने में पीछे रह गए हैं। राम का नाम लेना आसान है, लेकिन राम के आदर्शों पर चलना कठिन। सत्य की प्रशंसा करना सरल है, लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए साहस चाहिए। न्याय की बातें करना सहज है, लेकिन अपने हितों के विरुद्ध भी न्याय का समर्थन करना वास्तविक चरित्र की परीक्षा है। मर्यादा का उपदेश देना आसान है, लेकिन अपनी इच्छाओं और व्यवहार पर मर्यादा का अनुशासन लागू करना कठिन है।

राम केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, कर्तव्य और मर्यादा जैसे आदर्शों की प्रेरणा भी हैं। इन मूल्यों की सार्थकता तभी है, जब वे हमारे व्यवहार में दिखाई दें। यदि कोई व्यक्ति धार्मिक आयोजन में भाग लेकर लौटता है, लेकिन घर में अपने परिजनों के साथ दुर्व्यवहार करता है, कार्यस्थल पर बेईमानी करता है या समाज में कमजोर व्यक्ति का शोषण करता है, तो उसे अपने आचरण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। धर्म का वास्तविक मूल्य बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार से निर्धारित होता है।

रावण दहन को सार्थक बनाने के लिए जरूरी है कि हम इस पर्व को आत्मसुधार के अवसर में बदलें। प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर झांके और ईमानदारी से स्वीकार करे कि उसके व्यवहार में कौन-सी बुराई दूसरों को नुकसान पहुंचा रही है। कोई क्रोध पर नियंत्रण करना सीखे, कोई लालच से दूर रहने का संकल्प ले, कोई महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार को अपनी आदत बनाए और कोई अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय उचित आवाज उठाए। इसी तरह समाज भ्रष्टाचार, हिंसा, दहेज प्रथा और नशे जैसी समस्याओं के विरुद्ध सामूहिक प्रयास करे।

हमें यह भी समझना होगा कि बुराई का विरोध केवल भाषणों और नारों से नहीं होता। अपराध के पीड़ितों का साथ देना, अन्याय के विरुद्ध गवाही देने का साहस जुटाना, भ्रष्ट आचरण को प्रोत्साहित न करना और अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी रावण के विरुद्ध संघर्ष है। सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत किसी विशाल मंच से नहीं, बल्कि व्यक्ति के छोटे-छोटे नैतिक निर्णयों से होती है।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि रावण के पुतले कितने ऊंचे बनाए जाएं, बल्कि इस बात की है कि हमारा चरित्र कितना ऊंचा हो। आतिशबाजी की आवाज कितनी तेज हो, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अन्याय के विरुद्ध हमारी आवाज कितनी बुलंद हो। पुतले की ऊंचाई कुछ घंटों में समाप्त हो जाती है, लेकिन चरित्र की ऊंचाई पीढ़ियों तक समाज को दिशा दे सकती है।

दशहरे पर रावण का पुतला जलाकर लौटते समय यदि हम अपने भीतर के अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और अनैतिकता को ज्यों का त्यों लेकर घर लौटते हैं, तो हमें उत्सव की सफलता पर नहीं, अपनी विफलता पर विचार करना चाहिए। बुराई का अंत मैदान में खड़े पुतले के गिरने से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर अन्याय के प्रति असहमति और नैतिकता के प्रति प्रतिबद्धता जागने से होता है।

इस विजयादशमी पर संकल्प केवल इतना न हो कि रावण का पुतला जलाना है। संकल्प यह भी हो कि अपने भीतर की किसी एक बुराई को पहचानकर उसे समाप्त करना है, किसी अन्याय का विरोध करना है और अपने व्यवहार से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। जिस दिन हम ऐसा करने लगेंगे, उस दिन दशहरा केवल एक परंपरा नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का अभियान बन जाएगा।

रावण हर साल जलता है, लेकिन बुराई तब तक जीवित रहती है, जब तक हम उसे अपने भीतर और अपने आसपास जगह देते हैं। असली विजयादशमी उसी दिन होगी, जब पुतलों के साथ-साथ हमारी बुराइयां भी जलेंगी और हमारे आचरण में राम के आदर्श दिखाई देंगे।

लेखक परिचय: डॉ. सत्यवान सौरभ कवि, स्वतंत्र पत्रकार, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार हैं। वे आकाशवाणी एवं टीवी पैनलिस्ट भी हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान में पीएचडी की है। वे बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा से हैं।