नफरत की राजनीति पर तीखा प्रहार, लोकतंत्र बचाने का आह्वान

सत्य, विवेक और मानवीय मूल्यों की रोशनी से ही मिटेगा नफरत का अंधकार

✍️ कविता

तमस के अंधेरों में, जब सत्य भी घबराता है,
झूठ बड़े-बड़े मंचों से सच का पाठ पढ़ाता है।
कभी कोई तमस फैलाता, कोई दीप जलाता,
सत्ता के गलियारों में हरेक कोई खेल रचाता।

धर्म की चादर ओढ़, कितना कारोबार हुआ,
नफरत के बाजार में इंसान ही लाचार हुआ।
किसका सच है आवाज़, किसका अधिकार,
किस हिस्से धूप लिखें, किस हिस्से अंधकार।

जनता देख रही सब कुछ, समझे है हर चाल,
कब तक धर्म की आड़ में बिछता रहेगा जाल?
न मंदिर दोषी, न मस्जिद, न दोषी कोई धर्म,
दोष वहाँ है जहाँ मनुजता हो जाती है बेशर्म।

नफरत के तमस को मिलकर दूर भगाना है,
कॉकरोच राजनीति से लोकतंत्र बचाना है।
दीपक जलें विवेक के, सच का होगा सत्कार,
तमस मिटे मन से तब, खिल उठे नव संसार!


कवि परिचय:
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इंदौर–452011, मध्य प्रदेश

कविता का संदेश

यह कविता धर्म की आड़ में नफरत फैलाने वाली प्रवृत्तियों और सत्ता की राजनीति पर सवाल उठाती है। कवि का संदेश स्पष्ट है—मंदिर-मस्जिद या कोई धर्म नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों को कुचलने वाली सोच समाज के लिए खतरा है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए विवेक, सत्य, सद्भाव और इंसानियत का दीप जलाना आवश्यक है।