
कुंभकर्ण वध और इंद्रजीत यज्ञ विध्वंस की लीला ने दर्शकों को किया भावविभोर, अधर्म के विनाश का दिया संदेश

कौशल किशोर त्रिपाठी रिर्पोट
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा )। श्री रामलीला समिति आर्यनगर में सोमवार को रामलीला के दसवें दिन भक्ति, वीरता और धर्म-अधर्म के संघर्ष का जीवंत दृश्य देखने को मिला। श्री राधा विनोद लीला संस्थान, वृंदावन के निदेशक श्रीराम शर्मा ‘निमाई जी’ के निर्देशन में कलाकारों ने कुंभकर्ण वध और इंद्रजीत यज्ञ विध्वंस की लीला का प्रभावशाली मंचन किया। मंच पर सजीव हुए रामायण के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया और पूरा वातावरण जय श्रीराम के उद्घोष से भक्तिमय हो उठा।
रावण की जिद बनी लंका के विनाश का कारण
रामायण के प्रसंग के अनुसार, जब रावण को सूचना मिलती है कि लक्ष्मण मूर्छा से उबरकर पुनः युद्ध के लिए तैयार हो गए हैं, तो वह चिंतित होकर अपने पराक्रमी भाई कुंभकर्ण को जगाने का आदेश देता है। कुंभकर्ण छह महीने तक सोने और एक दिन जागने के लिए प्रसिद्ध था। उसे जगाने के लिए राक्षसों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
जागने के बाद जब कुंभकर्ण को पता चलता है कि रावण ने माता सीता का हरण किया है और विभीषण धर्म का साथ देने के लिए श्रीराम की शरण में चले गए हैं, तो वह अपने भाई को समझाने का प्रयास करता है। वह रावण को उसके अनुचित कार्यों के परिणामों से अवगत कराते हुए सीता को सम्मानपूर्वक लौटाने की सलाह देता है। लेकिन अहंकार में डूबा रावण उसकी बात मानने से इनकार कर देता है।
अपने भाई की हठधर्मिता से परिचित होने के बावजूद कुंभकर्ण युद्धभूमि में जाने का निर्णय लेता है। यह प्रसंग दर्शाता है कि परिवार के प्रति निष्ठा और धर्म के प्रति कर्तव्य के बीच मनुष्य किस प्रकार कठिन परिस्थिति में पड़ सकता है।
वानर सेना में मची भगदड़, श्रीराम ने किया कुंभकर्ण का वध
युद्धभूमि में पहुंचते ही कुंभकर्ण अपने विशाल शरीर और अपार शक्ति से वानर सेना पर कहर बरपाने लगता है। हनुमान, सुग्रीव और लक्ष्मण सहित अनेक योद्धा उससे मुकाबला करते हैं, लेकिन उसका पराक्रम वानर सेना के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। उसके आक्रमण से सेना में भगदड़ मच जाती है।
इसी बीच विभीषण अपने भाई कुंभकर्ण को समझाने पहुंचते हैं। कुंभकर्ण उन्हें अपने धर्म का पालन करने और स्वयं को अपना कर्तव्य निभाने देने की बात कहता है। अंततः श्रीराम और कुंभकर्ण के बीच भीषण युद्ध होता है। धर्म की रक्षा के लिए श्रीराम अपने दिव्य बाणों से कुंभकर्ण का वध कर देते हैं।
इस दृश्य के मंचन ने दर्शकों को यह संदेश दिया कि शक्ति और पराक्रम तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग न्याय और धर्म की रक्षा के लिए किया जाए। अधर्म के पक्ष में खड़ी विशाल शक्ति भी अंततः सत्य के सामने टिक नहीं सकती।
इंद्रजीत के यज्ञ विध्वंस से युद्ध ने लिया नया मोड़
कुंभकर्ण के वध के बाद लंका में शोक और चिंता का वातावरण छा जाता है। दूसरी ओर रावण का पुत्र इंद्रजीत अपनी मायावी शक्तियों के सहारे युद्ध का पलड़ा बदलने के उद्देश्य से यज्ञ करने बैठता है। इसकी सूचना मिलने पर लक्ष्मण वानर सेना के साथ यज्ञ स्थल पर पहुंचते हैं और यज्ञ विध्वंस कर देते हैं।
यज्ञ भंग होने के बाद लक्ष्मण और इंद्रजीत के बीच घमासान युद्ध छिड़ जाता है। दोनों ओर से वीरता और युद्ध कौशल का प्रदर्शन होता है। इस प्रसंग ने रामलीला में उत्सुकता बढ़ा दी और दर्शकों को आगामी युद्ध की घटनाओं के प्रति रोमांचित कर दिया।
पूजन-अर्चन के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
रामलीला मंचन से पूर्व सरदार जसपाल सिंह, मनोज कुमार, सौरभ कुमार, अवधेश सिंह, डॉ. वाई. सिंह, आरती अध्यक्ष पुष्प दंत जैन, सुधीर जैन और आचार्य बृजेश मणि मिश्रा ने भगवान श्रीराम का पूजन कर आरती उतारी। इसके बाद श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में रामलीला का शुभारंभ हुआ।
इस अवसर पर दीप अग्रवाल, मनीष अग्रवाल, संतोष राजभर, मीडिया प्रभारी अनुराग गुप्ता, भागवत दास अग्रवाल, नवोदित त्रिपाठी, समरेंदु कुमार सिंह, शीतल मिश्रा, जयदित्य सिंह, केवी अग्रवाल, शाश्वत अग्रवाल, पीयूष और अमरदीप गुप्ता सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
रामलीला का संदेश: अहंकार का अंत निश्चित, धर्म की विजय शाश्वत
आर्यनगर की रामलीला में कुंभकर्ण वध और इंद्रजीत यज्ञ विध्वंस की लीला केवल धार्मिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि जीवन के लिए महत्वपूर्ण संदेश भी है। रावण का अहंकार, कुंभकर्ण की विवशता, विभीषण की धर्मनिष्ठा और श्रीराम का न्यायपूर्ण आचरण मानव जीवन के विभिन्न पक्षों को उजागर करते हैं।
रामायण हमें सिखाती है कि गलत निर्णयों का परिणाम अंततः विनाशकारी होता है। सत्ता, सामर्थ्य और अहंकार के बल पर सत्य को दबाया नहीं जा सकता। धर्म, मर्यादा और न्याय के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही समाज के लिए आदर्श बनता है।
यही विजयादशमी का मूल संदेश है—अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, अन्याय और नकारात्मकता का अंत कर सत्य तथा सदाचार को जीवन में स्थान देना। जब तक समाज इन आदर्शों को आत्मसात नहीं करेगा, तब तक रावण के पुतले जलाने का उद्देश्य अधूरा रहेगा।
