साइंस मैथ्स का मैं अध्यापक,
एक हाथ में चाक एक में डस्टर,
एक क्लास से दूसरी क्लास तक,
सुबह से दौड़ूँ मैं ‘उड़ान’ भर कर।
थ्योरी, फ़ार्मूले पढ़ाया करता था,
अक्सर ख़ुद पढ़कर जाना होता था,
विद्यार्थी भी कई बहुत चतुर होते थे,
वह भी क्लास में ऊँची उड़ान भरते थे।
मुझको कभी कभी चक्कर दे देते थे,
अटपटे प्रश्न पूछ हैरान मुझे करते थे,
शिक्षक होना आसान नहीं होता है,
उसे सदा सर्व ज्ञानी होना अपेक्षित है।
अनुशासन प्रिय मैं स्वयं बहुत था,
सबको अनुशासन में रखता था,
दबदबा बहुत था साइंस टीचर का,
विद्यालय में मान सम्मान बहुत था।
प्रधानाचार्य थे सदा प्रभावित,
अध्यापक सब रहते मित्रवत्,
आदित्य आयु थी परिश्रम की,
जीवन में कुछ करके बनने की।
- डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
